हत्या का जवाब निलंबन नहीं निष्पक्ष न्याय होना चाहिए
न्यूज डेस्क
पटना/पुलिस द्वारा की गई किसी भी कथित गैरकानूनी हत्या का समर्थन कोई संवेदनशील समाज नहीं कर सकता। और करे भी क्यों? जिस देश में संविधान है, स्वतंत्र न्यायपालिका है और कानून का शासन है, वहाँ किसी भी आरोपी को अदालत से पहले मौत की सजा देने का अधिकार किसी को नहीं है।
आरा के भरत भूषण तिवारी प्रकरण ने पूरे बिहार को झकझोर दिया है। स्वयं मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी न्यायिक जांच का आदेश दे चुके हैं। दो सब-इंस्पेक्टर सहित कई पुलिसकर्मियों को निलंबित किया जा चुका है। यह प्रारंभिक प्रशासनिक कार्रवाई हो सकती है, लेकिन क्या यही न्याय है?
अब बिहार पुलिस के दो पूर्व डीजीपी गुप्तेश्वर पांडे और अभयानंद ने इस घटना पर गंभीर सवाल उठाए हैं। जब पुलिस व्यवस्था को भीतर से समझने वाले पूर्व शीर्ष अधिकारी ही कार्रवाई पर प्रश्नचिह्न लगा रहे हों, तब मामले की निष्पक्ष और पारदर्शी जांच की आवश्यकता और भी बढ़ जाती है।
निलंबन किसी अपराध का अंतिम दंड नहीं होता। यदि जांच में यह सिद्ध होता है कि किसी व्यक्ति की गैरकानूनी हत्या हुई है, तो भारतीय कानून के अनुसार हत्या का मुकदमा दर्ज होना चाहिए और दोषियों पर वैसी ही कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए जैसी किसी भी अन्य नागरिक पर होती है। कानून की सबसे बड़ी ताकत यही है कि वह वर्दी और बिना वर्दी के बीच भेद नहीं करता।
लोकतंत्र में पुलिस की शक्ति कानून से आती है, कानून से ऊपर होने से नहीं। यदि किसी निर्दोष की जान गई है, तो केवल विभागीय कार्रवाई पर्याप्त नहीं मानी जा सकती। न्याय तभी पूरा होगा जब सत्य सामने आए, दोषियों की जवाबदेही तय हो और न्यायालय कानून के अनुसार अंतिम निर्णय दे।

