1967 से 2026 तक बदलता रहा सियासी रंग कभी वामदल-कांग्रेस का गढ़ अब 30 साल से भाजपा का किला उपचुनाव में फिर दिलचस्प मुकाबला
कृष्णा कुमार
पटना/ राजधानी पटना की बांकीपुर विधानसभा सीट का सियासी इतिहास बेहद उतार-चढ़ाव भरा रहा है। कभी वामपंथी और कांग्रेस का दबदबा रही इस सीट पर पिछले 30 साल से भाजपा का कब्जा है। अब 2026 के उपचुनाव में एक बार फिर यहां त्रिकोणीय जंग ने सीट को राज्य की सबसे चर्चित सीट बना दिया है।
बांकीपुर का पहला चुनाव 1967 में हुआ, जब महामाया प्रसाद सिन्हा विधायक चुने गए। उनके इस्तीफे के बाद 1969 के उपचुनाव में सीपीआई के ए.के. सेन ने जीत दर्ज की। 1972 में फिर सीपीआई के सुनील मुखर्जी यहां से जीते।
1977 की जनता लहर में जनता पार्टी के ठाकुर प्रसाद ने बाजी मारी, लेकिन 1980 में कांग्रेस के रणजीत सिन्हा ने सीट वापस कांग्रेस की झोली में डाल दी।
1985 में लनिर्दलीय रामानंद यादव ने सभी समीकरण ध्वस्त कर जीत हासिल की और सबको चौंका दिया।
असली बदलाव 1995में आया भाजपा के नवीन किशोर प्रसाद सिन्हा ने 1995, 2000, फरवरी 2005 और अक्टूबर 2005 में लगातार जीत हासिल कर भाजपा का परचम लहराया।
2005 में उनके निधन के बाद 2006 के उपचुनाव में उनके बेटे नितिन नवीन पहली बार विधायक बने। नितिन नवीन ने पीछे मुड़कर नहीं देखा और 2010, 2015, 2020 और 2025 में लगातार जीत दर्ज कर बांकीपुर को भाजपा का अभेद्य गढ़ बना दिया।
2026 के उपचुनाव में बांकीपुर फिर चर्चा में रहा हैं। इस बार मुकाबला सीधा त्रिकोणीय था..
जनसुराज से पार्टी संस्थापक प्रशांत किशोर ने जीत हासिल की।
भाजपा से नीरज कुमार सिन्हा।
राजद से रेखा गुप्ता।

