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ईवीएम की आग और लोकतंत्र के सवाल

बिहार हलचल न्यूज ,जन जन की आवाज
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कृष्णा कुमार 

कोलकत्ता/वही हुआ जिसकी चर्चा गलियों, चौपालों, सोशल मीडिया और राजनीतिक बैठकों में लंबे समय से होती रही। पश्चिम बंगाल के कोलकाता में एक सरकारी इमारत में लगी आग और उसमें हजारों ईवीएम के जल जाने की खबर ने एक बार फिर कई सवालों को जन्म दे दिया है। सवाल सिर्फ मशीनों के जलने का नहीं है, सवाल उस भरोसे का है जिस पर लोकतंत्र खड़ा होता है।
जब किसी चुनाव के बाद लोगों के मन में शंकाएं पैदा हो जाती हैं, जब मतदान प्रतिशत और नतीजों के बीच लोग अपने-अपने हिसाब से सवाल उठाने लगते हैं, तब ऐसी घटनाएं उन शंकाओं को और गहरा कर देती हैं। आग ने सिर्फ मशीनों को नहीं जलाया, बल्कि जनता के मन में मौजूद अनेक प्रश्नों को भी हवा दे दी है। लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत जनता का विश्वास होता है। चुनाव हार-जीत का नाम है, लेकिन यदि मतदाता के मन में यह भावना घर कर जाए कि उसकी आवाज़ सुरक्षित नहीं है या उसके वोट की कहानी कहीं अधूरी रह गई है, तो यह किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए चिंता का विषय बन जाता है। आज बंगाल की राजनीति पहले से ही उथल-पुथल के दौर से गुजर रही है। दल-बदल, आरोप-प्रत्यारोप और सत्ता की खींचतान के बीच यह घटना सामने आई है। ऐसे में स्वाभाविक है कि लोग सवाल पूछेंगे, राजनीतिक दल सवाल उठाएंगे और आम नागरिक जवाब मांगेंगे। सवाल पूछना लोकतंत्र का अधिकार है और पारदर्शिता लोकतंत्र की जिम्मेदारी। हालांकि किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले जांच का इंतजार करना जरूरी है। भावनाओं के साथ-साथ तथ्यों का सम्मान भी उतना ही आवश्यक है। लेकिन यह भी सच है कि जब-जब ऐसी घटनाएं होती हैं, तब-तब लोकतंत्र का आईना धुंधला पड़ जाता है और जनता के मन में बेचैनी बढ़ जाती है।
एक वोट केवल एक बटन दबाने का नाम नहीं होता। उसके पीछे किसी किसान की उम्मीद होती है, किसी मजदूर का सपना होता है, किसी बेरोजगार युवक की आकांक्षा होती है, किसी मां की दुआ और किसी बुजुर्ग का विश्वास होता है। इसलिए जब ईवीएम जलने जैसी खबरें सामने आती हैं तो लोगों को सिर्फ मशीनों के नष्ट होने का दुख नहीं होता, बल्कि उन्हें अपने लोकतांत्रिक विश्वास के आहत होने का एहसास होता है। आज जरूरत है कि पूरी घटना की निष्पक्ष, पारदर्शी और समयबद्ध जांच हो। जो सच है वह देश के सामने आए। क्योंकि लोकतंत्र केवल चुनावों से नहीं चलता, लोकतंत्र भरोसे से चलता है। और जब भरोसा घायल होता है तो उसकी मरहम सिर्फ सच्चाई और पारदर्शिता ही बन सकती है। बंगाल की इस आग ने एक बार फिर यह याद दिला दिया है कि लोकतंत्र की रक्षा केवल कानूनों से नहीं होती, बल्कि जनता के विश्वास को जीवित रखने से होती है। मशीनें जल सकती हैं, इमारतें राख हो सकती हैं, लेकिन जनता का भरोसा नहीं जलना चाहिए। क्योंकि जिस दिन भरोसा राख हो जाएगा, उस दिन लोकतंत्र का सबसे मजबूत स्तंभ कमजोर पड़ जाएगा।