जदयू को इस बार भी किसी मुस्लिम चेहरे पर भरोसा नहीं जबकि पार्टी में ऐसे कई अनुभवी, शिक्षित, संघर्षशील और समर्पित मुस्लिम नेता मौजूद
सुरेंद्र सिंह की रिपोर्ट
पटना/बिहार विधान परिषद द्विवार्षिक चुनाव एवं उपचुनाव-2026 के लिए जनता दल (यू) द्वारा घोषित सभी उम्मीदवारों की सूची जारी किया है।
लेकिन एक सवाल दिल को बेचैन करता है। क्या जदयू को इस बार भी किसी मुस्लिम चेहरे पर भरोसा नहीं था? जबकि पार्टी में ऐसे कई अनुभवी, शिक्षित, संघर्षशील और समर्पित मुस्लिम नेता मौजूद हैं जो विधान परिषद जाने के पूरी तरह हकदार थे।
सच तो यह है कि वर्षों से मुसलमानों ने जदयू को कठिन परिस्थितियों में भी समर्थन दिया। जब-जब राजनीतिक हवाएँ बदलीं, तब-तब मुस्लिम समाज ने उम्मीदों के साथ नीतीश कुमार और जदयू पर भरोसा जताया। लेकिन आज जब प्रतिनिधित्व देने का अवसर आया, तो उस भरोसे को मजबूत करने का सुनहरा मौका शायद हाथ से निकल गया।
राजनीति केवल वोट लेने का नाम नहीं है, बल्कि हर तबके को सम्मानजनक भागीदारी देने का भी नाम है। यदि किसी समुदाय की हिस्सेदारी केवल वोट तक सीमित रह जाए और निर्णय लेने वाली संस्थाओं में उसकी आवाज़ न पहुँचे, तो स्वाभाविक रूप से सवाल उठेंगे और निराशा भी पैदा होगी।
अफसोस इस बात का नहीं कि किसी व्यक्ति को टिकट नहीं मिला, बल्कि अफसोस इस बात का है कि एक पूरे तबके की उम्मीदें फिर अधूरी रह गईं। जदयू अगर मुस्लिम समाज में अपना जनाधार और मजबूत करना चाहती, तो यह अवसर उसके लिए एक सकारात्मक संदेश देने का माध्यम बन सकता था।
उम्मीद है कि भविष्य में राजनीतिक दल केवल चुनावी गणित नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय, समान प्रतिनिधित्व और सभी वर्गों की भागीदारी को भी प्राथमिकता देंगे। लोकतंत्र तभी मजबूत होगा जब हर समुदाय को यह महसूस हो कि उसकी आवाज़ भी सत्ता के गलियारों तक पहुँच रही है।
लेकिन उम्मीद अभी बाकी है।क्योंकि लोकतंत्र में सवाल पूछना भी अधिकार है और बेहतर प्रतिनिधित्व की उम्मीद रखना भी।

