झंझारपुर लोकसभा की जनता आज एक ही सवाल पूछ रही है आखिर हमारे सांसद हैं कहां
संपादकीय
मधुबनी/झंझारपुर लोकसभा के बाबूबरही प्रखंड अंतर्गत बाली राजगढ़ की घटना को 7 दिन बीत चुके हैं। आरोप है कि प्रेम प्रसंग के एक मामले में पुलिस की गोली से एक युवक की मौके पर मौत हो गई, दूसरा डीएमसीएच में जिंदगी और मौत से जूझ रहा है और एक घायल है। एक परिवार उजड़ गया, गांव में मातम है लेकिन झंझारपुर के सांसद रामप्रीत मंडल का कहीं अता-पता नहीं।
ना पीड़ित परिवार से मुलाकात ना घायलों का हालचाल ना प्रशासन से सवाल। क्या यही जनप्रतिनिधि का धर्म है।
सवाल सिर्फ एक घटना का नहीं, सिस्टम का है
कहावत है अच्छा सांसद चुनेंगे तो अच्छा विकास होगा। लेकिन झंझारपुर की जनता खुद को ठगा महसूस कर रही है। जनता का आरोप है कि वर्तमान सांसद सिर्फ फोटो खिंचवाने, दिल्ली-पटना करने और मंचों पर दिखने में माहिर हैं, जमीनी हकीकत से उनका कोई वास्ता नहीं।
जब एक गरीब परिवार पुलिस की कार्रवाई में अपने बेटे को खो देता है तब उसे सबसे पहले अपने सांसद से उम्मीद होती है कि वह आकर ढांढस बंधाएगा, न्याय की लड़ाई में साथ खड़ा होगा। लेकिन जब 7 दिन बाद भी सांसद नहीं पहुंचते, तो जनता के मन में ये सवाल उठना लाजमी है कि क्या यह सांसद जनता के भरोसे, विश्वास और काम के लायक है?
नीतीश के भरोसे दूसरी बार सांसद लेकिन विकास के नाम पर जीरो
राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो रामप्रीत मंडल नीतीश कुमार के समीकरण के भरोसे दूसरी बार संसद पहुंचे हैं, लेकिन झंझारपुर में विकास आज भी जीरो पर है। ना बड़ी परियोजना, ना युवाओं के लिए रोजगार, ना स्वास्थ्य व्यवस्था में सुधार। और जब ऐसी दुखद घटना घटती है, तो संवेदना तक नहीं।
यह संपादकीय किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ नहीं बल्कि उस व्यवस्था के खिलाफ है जहां नेता चुनाव के समय जनता के सामने हाथ जोड़ता है और चुनाव जीतने के बाद जनता की सुध लेना भूल जाता है।
बिहार हलचल न्यूज की दो टूक
1. बाली राजगढ़ मामले में पुलिस फायरिंग की निष्पक्ष न्यायिक जांच होनी चाहिए।
2. मृतक के परिजनों को उचित मुआवजा और घायलों का बेहतर इलाज सरकार सुनिश्चित करे।
3. और माननीय सांसद जी को, यदि आप यह संपादकीय पढ़ रहे हैं, तो एक बार बाली राजगढ़ जाइए। AC कमरे से निकलकर उस मां से मिलिए जिसने अपना बेटा खोया है। जनता फोटो नहीं, साथ चाहती है।
लोकतंत्र में जनता ही सबसे बड़ी मालिक है। आज जनता चुप है लेकिन आने वाले समय में यही जनता फैसला लेगी और देगी भी। क्योंकि कुर्सी हमेशा नहीं रहती, याद रहता है तो सिर्फ व्यवहार।

