SIR के बाद चुनावों पर क्यों उठ रहे हैं सवाल? मुख्य चुनाव आयुक्त से देश मांग रहा जवाब
संपादकीय
मैंने पहले भी कई बार कहा है कि जिन-जिन राज्यों में SIR (Special Intensive Revision) के बाद चुनाव हुए हैं, वहाँ चुनावी प्रक्रिया को लेकर गंभीर सवाल खड़े हुए हैं। आखिर ऐसा क्या है कि SIR के बाद चुनावी प्रक्रिया पर लगातार सवाल उठ रहे हैं। यह सवाल अब सिर्फ विपक्ष का नहीं, आम जनता का भी बन गया है।
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से आज देश जवाब मांग रहा है। अगर चुनाव आयोग के फैसलों में सब कुछ पारदर्शी है, तो विपक्ष और जनता द्वारा उठाए जा रहे सवालों का स्पष्ट और तथ्यात्मक जवाब क्यों नहीं दिया जाता। लोकतंत्र में जवाबदेही से बचना लोकतंत्र को कमजोर करता है।
भारत एक लोकतांत्रिक देश है। चुनाव आयोग किसी एक राजनीतिक दल का नहीं, बल्कि पूरे देश और हर एक मतदाता का संवैधानिक संस्थान है। यह संस्था 140 करोड़ लोगों के मताधिकार की रक्षक है। इसलिए अगर आयोग के किसी फैसले पर सवाल उठते हैं, तो सभी राजनीतिक दलों को दलगत राजनीति से ऊपर उठकर लोकतंत्र और मताधिकार की रक्षा के लिए एक साथ आवाज उठानी चाहिए।
लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह भी है कि जब भी चुनाव आयोग पर सवाल उठते हैं, सत्ता पक्ष की ओर से आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के समर्थन में इतनी मजबूती से आवाज क्यों उठती है। क्या यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया के लिए स्वस्थ संकेत है?
हम पूछना चाहते हैं
क्या लोकतंत्र में सवाल पूछना गलत है।
क्या मतदाता सूची और चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता की मांग करना गलत है।
देश को आरोप-प्रत्यारोप नहीं, बल्कि साफ और स्पष्ट जवाब चाहिए। क्योंकि लोकतंत्र में सबसे बड़ा मालिक कोई नेता, कोई पार्टी या कोई संस्थान नहीं बल्कि जनता और उसका एक वोट है। और उस वोट की पवित्रता बनी रहनी चाहिए।

