जब पेपर लीक के आरोपी डॉक्टर बनकर मरीज देख रहे हैं तो सिस्टम पर भरोसा कैसे हो
सेंट्रल डेस्क
बेंगलुरु/देश में NEET, NET जैसी परीक्षाओं में गड़बड़ी के बाद सरकारें फास्ट-ट्रैक कोर्ट और कड़े कानून की बात कर रही हैं। लेकिन कर्नाटक का 2006 RGUHS PG मेडिकल एंट्रेंस पेपर लीक केस इस दावे की पोल खोल रहा है। 20 साल बीत गए, लेकिन इस मामले में आज तक ट्रायल शुरू नहीं हो सका।
12 फरवरी 2006 को राजीव गांधी यूनिवर्सिटी ऑफ हेल्थ साइंसेज* ने PG मेडिकल एंट्रेंस टेस्ट PGET कराया था। परीक्षा के बाद रिजल्ट में चौंकाने वाला पैटर्न सामने आया। CBI की चार्जशीट के मुताबिक MBBS में कम अंक लाने वाले कई अभ्यर्थी अचानक PGET में टॉप पर पहुंच गए।छात्रों ने सड़क से लेकर प्रेस तक हंगामा किया। आरोप लगे कि पेपर लीक हुआ है। विरोध बढ़ने पर 25 अप्रैल 2006 को कर्नाटक सरकार ने मामला CBI को सौंप दिया। 11 अक्टूबर 2005 RGUHS ने PGET कराने की अधिसूचना जारी की।12 फरवरी 2006 परीक्षा हुई। पेपर 8 सीरीज में छपकर सील बंद ट्रंक में भेजे गए।17 फरवरी 2006 रिजल्ट घोषित।
3-4 मार्च 2006 दीक्षांत समारोह में छात्रों ने प्रदर्शन किया। मामला राष्ट्रीय मीडिया में आया।मार्च 2006 राज्य सरकार ने 3 सदस्यीय जांच कमेटी बनाई।2008 CBI ने तत्कालीन VC PS प्रभाकरण रजिस्ट्रार हुक्केरी और 16 अभ्यर्थियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की। केस CBI स्पेशल कोर्ट में शुरू हुआ।2015 कई आरोपियों ने बरी करने की अर्जी दी।
27 जनवरी 2020 CBI कोर्ट ने सभी की बरी अर्जी खारिज की।2023हाईकोर्ट ने भी बरी करने से मना कर दिया।
2026 में भी मामला उसी CBI स्पेशल कोर्ट में लंबित है। इसे फास्ट-ट्रैक कोर्ट में नहीं भेजा गया। इस बीच आरोपी VC और रजिस्ट्रार रिटायर हो चुके हैं। वहीं चार्जशीट में नामजद 16 अभ्यर्थियों में से कई अब डॉक्टर बनकर बड़े अस्पतालों में प्रैक्टिस कर रहे हैं।
वकील का कहना है 2015-16 में केस को फास्ट-ट्रैक कोर्ट भेजा गया था, लेकिन फिर वापस आ गया। ऐसे मामलों में सबूत जुटाना बहुत मुश्किल है। RGUHS केस में एक आरोपी सरकारी गवाह बन गया है।
1. जब पेपर लीक के आरोपी डॉक्टर बनकर मरीज देख रहे हैं, तो सिस्टम पर भरोसा कैसे हो।
2. 20 साल में न VC पर कार्रवाई हुई, न अभ्यर्थियों पर। तो फिर परीक्षा की पवित्रता कौन बचाएगा।

