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8 में 5  बुद्धिजीवी वर्ग का फैसला और एक समाज के लिए आत्ममंथन का मौका

बिहार हलचल न्यूज ,जन जन की आवाज
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संपादकीय – बिहार हलचल न्यूज

बिहार विधान परिषद की 8 स्नातक और शिक्षक सीटों पर आए परिणामों ने बिहार की राजनीति में एक नई बहस छेड़ दी है। 8 में से 5 सीटों पर भूमिहार समाज के उम्मीदवारों का जीतना सिर्फ एक आंकड़ा नहीं है, यह बिहार के सबसे प्रबुद्ध माने जाने वाले मतदाता वर्ग – स्नातक और शिक्षक का स्पष्ट संदेश है।

पटना शिक्षक से डॉ. संजीव कुमार, पटना स्नातक से नीरज कुमार, दरभंगा शिक्षक से सुरेश राय, दरभंगा स्नातक से सर्वेश कुमार और तिरहुत शिक्षक से नरेंद्र कुमार की जीत ने साबित किया है कि जब चुनाव योग्यता, शिक्षा और प्रतिनिधित्व के आधार पर होता है, तो परिणाम जातिवादी शोर से अलग होते हैं। स्नातक और शिक्षक मतदाता को हमेशा से बिहार का सबसे जागरूक मतदाता माना गया है, और इस बार उसने योग्यता को चुना है।

लेकिन यह जीत जश्न से ज्यादा जिम्मेदारी का क्षण है।

आजादी के बाद बिहार की राजनीति, शिक्षा और समाज में जिस वर्ग की निर्णायक भूमिका थी, वह बीते दो दशकों में हाशिये पर चला गया था। इस जीत ने एक बार फिर उस वर्ग को मुख्यधारा में लौटने का मौका दिया है। सवाल यह है कि क्या यह वापसी स्थायी होगी।

हमारा स्पष्ट मानना है कि यह वापसी तभी स्थायी होगी जब जीत का अहंकार नहीं बल्कि विनम्रता और आत्ममंथन होगा।

हमारे बुजुर्गों ने हमें एक चेतावनी दी है जो आज के हर विजयी उम्मीदवार और उनके समर्थकों को गांठ बांध लेनी चाहिए धैर्य रखें और खुशी में कोई अनर्गल कार्य न करें।

आप ऑर्केस्ट्रा में नाचने के लिए नहीं जन्मे हैं आप प्रतिनिधित्व करने के लिए जन्मे हैं।

यह पंक्ति आज के बिहार के लिए सबसे बड़ी सीख है। प्रतिनिधित्व का अर्थ है , शिक्षा, संस्कार, और नेतृत्व। यदि जीत के बाद आप वही करेंगे जो दूसरे करते आए हैं ।शक्ति प्रदर्शन, अहंकार, और ओछी राजनीति तो यह जीत भी अगली हार की नींव बन जाएगी।पूर्वजों के आदर्श को जीवन में उतारना होगा। अतीत को सम्मान देना होगा, उससे सीखना होगा ताकि वर्तमान पीढ़ी को संस्कार मिले और आने वाली पीढ़ी को सही दिशा मिले।

याद रखिए आने वाली पीढ़ी कैसी होगी और उसका प्रतिनिधित्व कौन करेगा इसका फैसला आज आपके व्यवहार से तय होगा। आज का आपका एक-एक कदम भविष्य की दिशा लिखेगा।

यह 5 सीटों की जीत बिहार की राजनीति में संतुलन की वापसी का संकेत है। इसे बरकरार रखने के लिए बुद्धिजीवी वर्ग को अब राजनीति में अपनी खोई हुई गरिमा वापस लानी होगी।