पटना स्नातक सीट पर जदयू में भूचाल क्या ऑपरेशन लोटस का दूसरा अध्याय है
न्यूज डेस्क
बिहार/पटना स्नातक निर्वाचन क्षेत्र का चुनाव केवल एक एमएलसी सीट का चुनाव नहीं था, यह जदयू के भीतर के अंतर्द्वंद्व का आईना बन गया है। पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में मोकामा के बाहुबली विधायक अनंत सिंह पर हुई कार्रवाई ने पूरे संगठन को हिला कर रख दिया है।
अनंत सिंह का यह कहना कि नीतीश जी के बिना पार्टी समाप्त हो गई है।यह केवल एक बयान नहीं, जदयू के जमीनी सच की स्वीकृति है। यह वही अनंत सिंह हैं जो कभी नीतीश कुमार के सबसे भरोसेमंद सिपहसलार माने जाते थे। आज जब वही कह रहे हैं कि पार्टी का जनाधार नीतीश के व्यक्तित्व तक सिमट गया है, तो यह समय है आत्ममंथन का न कि कार्रवाई का।सबसे बड़ा सवाल जो पटना की सियासी गलियों में गूंज रहा है क्या यह वही ऑपरेशन लोटस’ है जिसकी आहट शिवसेना में सुनाई दी थी।
महाराष्ट्र में जिस तरह शिवसेना के दिग्गजों को तोड़कर सरकार बनाई गई, क्या उसी फॉर्मूले पर बिहार में भी काम हो रहा है।पटना स्नातक चुनाव में अनंत सिंह के विरोध को हवा देकर क्या केंद्रीय मंत्री राजीव रंजन उर्फ ललन सिंह ने जदयू की ताबूत में अंतिम कील ठोकने का काम किया है?
ललन सिंह जो कभी नीतीश कुमार की परछाई थे, आज दिल्ली में बैठकर मुंगेर से केंद्र की राजनीति कर रहे हैं। चर्चा है कि एमएलसी चुनाव में अनंत सिंह के विरोध के पीछे ललन सिंह का मौन समर्थन था। अगर यह सच है तो यह जदयू के लिए दोहरी मार है एक बाहर से बीजेपी का ऑपरेशन लोटस और दूसरा भीतर से अपनों का वार।
जदयू आज उस चौराहे पर खड़ी है जहां उसका संगठनात्मक ढांचा बिखर रहा है और नेतृत्व का करिश्मा अकेले चुनाव नहीं जिता सकता। अनंत सिंह पर कार्रवाई से अनुशासन का संदेश तो गया लेकिन कार्यकर्ताओं में यह संदेश भी गया कि पार्टी अपने ही पुराने स्तंभों को गिरा रही है।
समय बताएगा कि नीतीश के बिना पार्टी समाप्त होने का अनंत सिंह का दावा कितना सच है लेकिन इतना तय है कि पटना स्नातक का यह चुनाव जदयू के अंत की शुरुआत न बन जाए इसके लिए नीतीश कुमार को ऑपरेशन लोटस से ज्यादा ऑपरेशन विश्वास पर ध्यान देना होगा।

