बिहार में सरकारी स्कूल का सपना और सत्ता का दिखावा जब खुद का बच्चा प्राइवेट में तो सरकारी स्कूल कैसे सुधरेगा
संपादकीय
बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने एक बार फिर वही पुराना राग अलापा है ।अब मंत्री मुख्यमंत्री और अधिकारियों के बच्चे सरकारी विद्यालय में पढ़ेंगे। बयान बड़ा है, कैबिनेट में चर्चा भी हो गई, अखबारों की सुर्खियां भी बन गईं। लेकिन सवाल वही है जो हर बार उठता है धरातल पर क्या है शून्य।
ये बयान नया नहीं है। हर सरकार आती है, सरकारी शिक्षा व्यवस्था को सुधारने का दावा करती है और मंत्री-अधिकारियों के बच्चों को सरकारी स्कूल में भेजने का लॉलीपॉप दिखाती है। लेकिन हकीकत में किसी मंत्री का बच्चा, किसी DM का बच्चा, किसी सचिव का बच्चा सरकारी स्कूल की टूटी बेंच पर बैठा दिखा है क्या।
कैबिनेट में पास जमीन पर फेल ये कैसी नीति है
अगर सच में कैबिनेट में यह फैसला हो गया है तो आज तक आदेश कहां है। शपथ पत्र कहां है किसी मंत्री ने अपने बच्चे का नामांकन सरकारी स्कूल में कराया क्या? किसी अधिकारी ने अपने बच्चे का TC प्राइवेट से कटवा कर सरकारी में लगवाया क्या? नहीं।
तो फिर ये बयान है किसके लिए सिर्फ जनता को गुमराह करने के लिए
बिहार की जनता आज पूछ रही है ।अगर करना ही नहीं है तो बोलते क्यों हो? सरकारी स्कूल में आज भी शिक्षक नहीं, बेंच नहीं, शौचालय में पानी नहीं, लैब में सामान नहीं। और आप कह रहे हो कि हमारे बच्चे वहीं पढ़ेंगे। पहले स्कूल तो उस लायक बना दीजिए कि आपका बच्चा वहां पढ़ सके।
जनता अब गुमराह नहीं होगी
बिहार की जनता अब समझदार हो चुकी है। वो जानती है कि चुनाव आते ही ऐसे बड़े-बड़े बयान आएंगे। सरकारी स्कूल के बच्चों के भविष्य से खेलना बंद कीजिए। अगर हिम्मत है तो कल ही एक सूची जारी कीजिए । किस मंत्री का बच्चा किस सरकारी स्कूल में पढ़ रहा है। और अगर नहीं जारी कर सकते, तो माफी मांगिए कि आपने जनता को फिर से गुमराह किया।
सरकारी स्कूलों को सुधारना है तो AC कमरे में बयान नहीं, जमीन पर काम चाहिए। नहीं तो इतिहास यही लिखेगा। बोले थे सम्राट चौधरी, हुआ कुछ नहीं।

