राजद में कुर्सी बची है जोश नहीं क्या तेजस्वी यादव संभाल पाएंगे डूबती नाव
संपादकीय
बिहार/राष्ट्रीय जनता दल आज दोहरी चुनौती से गुजर रही है। एक तरफ बाहर से भाजपा-जदयू की घेराबंदी है, तो दूसरी तरफ अंदर से कार्यकर्ताओं का टूटता भरोसा। पार्टी के कार्यकारी राष्ट्रीय अध्यक्ष और विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव के पास पद है, कद है, लेकिन जमीन पर कार्यकर्ता के मन में सवाल है ।हमारी लड़ाई कौन लड़ेगा।
पिछले दिनों एक विधायक के पाला बदलने की चर्चा ने इसी सवाल को और बड़ा कर दिया। कार्रवाई नहीं हुई। संदेश साफ गया। पार्टी में अनुशासन से ज्यादा मजबूरी है। अगर गंगा की धारा की तरह दो-चार विधायक और आस्था बदल लें, तो विपक्ष की कुर्सी भी धारा में बह सकती है।
थके हुए नायक की थकी हुई पार्टी
तेजस्वी यादव के सामने अभी लंबी राजनीतिक पारी बाकी है। तीन दशक से ज्यादा का समय है। उनके लिए मुख्यमंत्री बनना एक दिन की बात हो सकती है, और नेता प्रतिपक्ष तो वे जब तक चाहें बने रह सकते हैं। इसलिए उनमें सत्ता की हड़बड़ी नहीं दिखती।
लेकिन समस्या यहीं से शुरू होती है। राजद में ऐसे सैकड़ों नेता-कार्यकर्ता हैं जो अपने राजनीतिक जीवन के अंतिम पड़ाव पर खड़े हैं। किसी ने सत्ता का स्वाद चखा है, तो कोई सिर्फ इंतजार में ही बूढ़ा हो गया। उन्हें लगता है कि तेजस्वी के लिए राजद एक राजनीतिक मिशन नहीं, बल्कि पारिवारिक विरासत का हिस्सा भर है। पार्टी के लिए सड़क पर उतरकर संघर्ष करने का जो जज्बा चाहिए, वो नदारद है और यही कार्यकर्ताओं की सबसे बड़ी कुंठा है।
विकल्पहीनता की बेबसी
राजद का कार्यकर्ता आज सबसे ज्यादा असहाय है। वह न राजद में अपना भविष्य देख पा रहा है, न राजद से बाहर उसकी कोई स्वीकार्यता है। पिछले 35 सालों में बिहार की राजनीति ने ऐसा करवट लिया है कि कई दलों की पूरी राजनीति ही MY समीकरण के विरोध पर टिकी हो गई है। सामाजिक ध्रुवीकरण को राजनीतिक हथियार बना दिया गया है। ऐसे में यादव-मुस्लिम पृष्ठभूमि के कार्यकर्ता के लिए दूसरे दलों के दरवाजे लगभग बंद हैं।
वह न जा पा रहा है, न टिक पा रहा है
हम यह नहीं कहते कि इसके लिए अकेले तेजस्वी यादव जिम्मेदार हैं। यह दौर ही ऐसा है, लेकिन लड़ाई छोड़ देना किसी रणनीति का हिस्सा नहीं हो सकता। जब नेता ही रणछोड़ जैसा दिखने लगे, तो कार्यकर्ता हथियार कैसे उठाएगा।
घर के चिराग से लगी आग
कहावत है घर में आग लगी घर के चिराग से। राजद के साथ भी कुछ ऐसा ही हो रहा है। पार्टी में अगर आग लगेगी, तो वह बाहर से नहीं, अंदर की उदासीनता से लगेगी। आज कार्यकर्ता निराश नहीं, कुंठित है। उसे लगता है कि संभावनाओं के सारे रास्ते बंद हो गए हैं।
और जब संभावनाएं खत्म होती हैं, तो बगावत शुरू होती है। आज एक विधायक गया है, कल चार और जाएंगे, तब पार्टी को खड़ा करने के लिए नारा लगाने वाला भी नहीं मिलेगा।
तेजस्वी यादव को समझना होगा कि विरासत में कुर्सी मिलती है, कार्यकर्ता नहीं। कार्यकर्ता को रोज जीतना पड़ता है, उसके मन में उम्मीद की रोशनी जलाए रखनी पड़ती है। अगर वह रोशनी बुझ गई, तो सिर्फ पार्टी नहीं, उनका अपना भविष्य भी अंधेरे में चला जाएगा।

