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तारीख़ गवाह है ज़ुल्म कुछ पल का मेहमान होता है हक़ की आवाज़ उठाने वाले ही इंसान कहलाते हैं

बिहार हलचल न्यूज ,जन जन की आवाज
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न्यूज डेस्क 

दिल्ली/जिसकी ज़रूरत थी वही तस्वीर आज सामने आई सलाम उस हौसले को, जो सत्ता से नहीं, सच से टकराता है। याद रखिए, यही दौर कभी महात्मा गांधी और पंडित जवाहरलाल नेहरू ने भी देखा था। जेल की सलाख़ें, गिरफ़्तारियाँ और दमन लेकिन इतिहास ने हमेशा सच, सब्र और संघर्ष को ही अमर किया है।

लोकतंत्र में सवाल पूछना गुनाह नहीं होता। राहुल गांधी, अखिलेश यादव और अन्य विपक्षी नेताओं को हिरासत में लेना कई सवाल खड़े करता है। अगर मुद्दा छात्रों की मांगों का था, तो बातचीत का रास्ता क्यों नहीं चुना गया? और यदि हिरासत जरूरी थी, तो देश के नेता प्रतिपक्ष के साथ गरिमा और शालीनता क्यों नहीं दिखाई गई।लोकतंत्र की ताक़त संवाद में है, दमन में नहीं।