बिहार पंचायत चुनाव पर संकट 1991 के आंकड़ों पर पंचायत चुनाव क्यों नए जाति सर्वे के बीच बिहार में उठे बड़े सवाल चुनाव टलने की भी आशंका
राम दुलार yadav
बिहार / पंचायत चुनाव अब नए विवाद में घिरते नजर आ रहे हैं। अक्टूबर-नवंबर में प्रस्तावित चुनाव को लेकर मुखिया, सरपंच और पंचायत प्रतिनिधियों ने राज्य निर्वाचन आयोग के सामने बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। उनका कहना है कि जब राज्य में 2022-23 का जाति आधारित सर्वे पूरा हो चुका है, तो फिर पंचायत चुनाव 1991 के पुराने आंकड़ों और 1994 के परिसीमन के आधार पर क्यों कराए जा रहे हैं। इसी मुद्दे को लेकर प्रतिनिधियों ने आयोग में शिकायत दर्ज कराई है, जिस पर 15 मई को सुनवाई होनी है।
पंचायत प्रतिनिधियों का आरोप है कि सरकार बिना सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय ‘ट्रिपल टेस्ट’ प्रक्रिया पूरी किए चुनाव कराने की तैयारी में है। उनका कहना है कि अगर नई जातीय गणना के बावजूद पुराने आंकड़ों पर आरक्षण और परिसीमन तय किया गया, तो पूरा चुनाव कानूनी विवाद में फंस सकता है। प्रतिनिधियों ने यूपी पंचायत चुनाव का उदाहरण देते हुए कहा है कि वहां भी इसी वजह से चुनाव प्रभावित हुए थे। अब बिहार में भी मामला पटना हाईकोर्ट तक पहुंच चुका है और अगर आयोग ने मांगें नहीं मानीं, तो कानूनी लड़ाई और तेज हो सकती है।
मुखिया महासंघ अध्यक्ष मिथिलेश राय और पंच-सरपंच संघ अध्यक्ष आमोद निराला ने साफ कहा है कि पंचायत चुनाव की वर्तमान तैयारी पुराने डेटा पर आधारित है, जो अब परिस्थितियों के हिसाब से उचित नहीं मानी जा सकती। उनका कहना है कि नए जाति सर्वे के आधार पर पंचायतों की नई आरक्षण सूची तैयार होनी चाहिए और परिसीमन की प्रक्रिया भी नए सिरे से की जानी चाहिए।
प्रतिनिधियों की दो प्रमुख मांगें हैं। पहली, 2022-23 के जाति आधारित सर्वे को आधार बनाकर पंचायतों में आरक्षण तय किया जाए। दूसरी, जब तक नया परिसीमन पूरा नहीं हो जाता, तब तक पंचायत चुनाव 2026 की प्रक्रिया पर रोक लगाई जाए।
दरअसल, इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा केंद्र सुप्रीम कोर्ट का ‘ट्रिपल टेस्ट’ नियम है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि स्थानीय निकाय चुनावों में ओबीसी आरक्षण देने से पहले वैज्ञानिक आधार पर डेटा संग्रह, आयोग की रिपोर्ट और आरक्षण सीमा तय करना जरूरी है। अगर यह प्रक्रिया पूरी नहीं होती, तो ओबीसी आरक्षित सीटों को सामान्य श्रेणी मानकर चुनाव कराना पड़ सकता है।
अब सबकी नजर 15 मई की सुनवाई पर टिकी है। क्योंकि इसी से तय होगा कि बिहार में पंचायत चुनाव तय समय पर होंगे या फिर नया कानूनी और राजनीतिक विवाद चुनावी प्रक्रिया को लंबा खींच देगा।

