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बिहार में भूमि सुधार की अधूरी कहानी और बटाईदारों के अधिकारों की अनदेखी

बिहार हलचल न्यूज ,जन जन की आवाज
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राजकुमार यादव 

पटना /बिहार में भूमि सुधार का प्रश्न स्वतंत्रता के बाद से ही सामाजिक न्याय,आर्थिक समानता की दिशा मे ठोस कदम उठाते हुए डी बंधोपाध्याय की भूमि सुधार आयोग की सिफारिश को लागु करे। ये बाते किसान संघर्ष समिति के अध्यक्ष सह राजद नेता जवाहर यादव निराला ने राज्य सरकार से मांग की हैं। उन्होंने कहा कि 1960 के दशक में कांग्रेस सरकार ने भूमि सुधार की प्रक्रिया प्रारंभ की गयी थी, जिसका उद्देश्य ज़मींदारी व्यवस्था के दुष्प्रभावों को समाप्त करना और भूमिहीन किसानों को अधिकार दिलाना था। हालांकि, प्रभावशाली ज़मींदार वर्ग के कड़े विरोध के कारण यह पहल धीरे-धीरे ठंडे बस्ते में चली गई।
लगभग डेढ़ दशक बाद, वर्ष 2005 में जब नीतीश कुमार ने पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में पदभार संभाला, तो भूमि सुधार की दिशा में नई उम्मीद जगी। इस उद्देश्य से उन्होंने प्रसिद्ध प्रशासनिक अधिकारी डी. बंद्योपाध्याय की अध्यक्षता में भूमि सुधार आयोग का गठन किया। डी. बंद्योपाध्याय वही अधिकारी थे जिन्होंने 1977 में पश्चिम बंगाल में वाममोर्चा सरकार के दौरान ‘ऑपरेशन वर्गा’ का सफल नेतृत्व किया था। इस ऐतिहासिक अभियान के तहत वर्गादार (बटाईदार) किसानों को कानूनी अधिकार दिए गए, जिसे देश में भूमि सुधार का सबसे सफल मॉडल माना जाता है।
बिहार भूमि सुधार आयोग ने गहन अध्ययन और विचार-विमर्श के बाद अप्रैल 2008 में अपनी रिपोर्ट राज्य सरकार को सौंपी। इस रिपोर्ट में बटाईदार किसानों को विधिक अधिकार प्रदान करने की सिफारिश की गई थी। आयोग ने सुझाव दिया कि बटाईदारों को उस भूमि पर अधिकार का प्रमाण-पत्र (पर्चा) दिया जाए, जिस पर वे खेती कर रहे हैं। इस पर्चे में भूमि स्वामी का नाम और खेत का विवरण दर्ज होना चाहिए, साथ ही इसकी एक प्रमाणित प्रति भूमि मालिक को भी दी जानी चाहिए, ताकि पारदर्शिता और संतुलन बना रहे।
रिपोर्ट में इसके अतिरिक्त भी कई महत्वपूर्ण सुझाव शामिल थे, जिनका उद्देश्य कृषि क्षेत्र में न्यायसंगत संबंध स्थापित करना और उत्पादन क्षमता को बढ़ाना था। लेकिन दुर्भाग्यवश, इन सिफारिशों को लागू करने की दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।
उन्होंने कहा कि राजनीतिक परिस्थितियों और ज़मींदार वर्ग के प्रभाव को देखते हुए, नीतीश कुमार सरकार ने भी पूर्ववर्ती सरकारों की तरह इन सिफारिशों को अमल में लाने से परहेज़ किया। माना जाता है कि ज़मींदार वोट बैंक को प्रभावित न करने की राजनीतिक मजबूरियों ने इस महत्वपूर्ण सुधार प्रक्रिया को रोक दिया।आज भी बिहार में बटाईदार किसान असुरक्षा और अधिकारहीनता के साथ खेती करने को मजबूर हैं। भूमि सुधार आयोग की रिपोर्ट, जो किसानों के जीवन में सकारात्मक बदलाव ला सकती थी, सरकारी फाइलों में धूल फांक रही है।
यह आवश्यक है कि राज्य सरकार इस मुद्दे पर पुनर्विचार करे और भूमि सुधार के लंबित एजेंडे को प्राथमिकता दे, ताकि सामाजिक न्याय और आर्थिक समानता की दिशा में ठोस प्रगति हो सके।