जदयू में एक हैं संजय कुमार झा पार्टी के कार्यकारी राष्ट्रीय अध्यक्ष मूलत: भाजपाई
सुरेंद्र कुमार सिंह
पटना/जदयू को मिट्टी में मिला देने की सुपारी लेकर नीतीश के साथ आये हैं। उन्होंने एक शिगूफा छोड़ा है कि जदयू का नाम बदलकर जनता दल नीतीश कर देना चाहिए। इसके लिए उन्होंने पार्टी के गठन और विस्तार में नीतीश कुमार के योगदान का हवाला दिया है।
दरअसल संजय झा जदयू नाम के एक वैचारिक धारा को खत्म कर एक व्यक्ति के नाम के साथ पार्टी को बांध देना चाहते हैं। ताकि जदयू भी लोजपा, रालोमो और हम की तरह व्यक्तिनिष्ठ हो जाए।
जदयू पार्टी से हमारा कोई रिश्ता नहीं है। इसके बावजूद एक सुझाव देना चाहते हैं कि जदयू का नाम बदलकर जनता दल निशांत कर देना चाहिए। निशांत नीतीश कुमार के पुत्र हैं और पार्टी के भविष्य भी हैं। उनके पास राजनीति की पूरी पारी बची हुई है। वे हताश गैरसवर्ण कार्यकर्ताओं की उम्मीद भी हैं और भरोसा भी। पार्टी के साथ निशांत नाम ज्यादा लाभदायक और व्यावहारिक होगा।
संजय झा ने जनता दल नीतीश के नाम का जो पाशा फेका है, वह जदयू को खत्म करने सबसे बड़ी साजिश है। इसके व्यावहारिक पक्ष को समझिये। किसी पार्टी का न विलय होता है और न नामांतरण होता है। पार्टी को सीधे-सीधे नये सिरे से पंजीयन कराना होता है। जदयू के संदर्भ को ही समझिये। 2003 में समता पार्टी का जदयू में विलय नहीं हुआ था, बल्कि समता पार्टी के सांसदों और विधायकों ने संवैधानिक प्रक्रिया के तहत दल बदल कर जदयू की सदस्यता ग्रहण की थी। तत्काल संगठन के स्तर पर कोई बदलाव नहीं हुआ था। उपेंद्र कुशवाहा सबसे बढ़िया उदाहरण हैं। उन्होंने जब मर्जी आयी, नयी पार्टी बना ली।
यदि जनता दल नीतीश अस्तित्व में आता है तो सबसे पहले उसको अपना चुनाव चिह्न छोड़ना होगा। पार्टी का नाम भी छोड़ना होगा। मतलब पार्टी का नाम और चुनाव चिह्न दोनों नया मिलेगा। जबकि कार्यकर्ता पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न दोनों से जुड़े होते हैं। फिर पार्टी के नाम पर बैंक बैलेंस और संचालन का पूरा तंत्र बदलना होगा। यह सामान्य प्रक्रिया लगती है, लेकिन इससे पार्टी का आधार खोखला होगा।
जदयू नेताओं को यह मानने में कोई परहेज नहीं करना चाहिए कि जदयू के गैरसवर्ण कार्यकर्ता नीतीश कुमार से भावनात्मक रूप से जुड़े रहे हैं, जबकि सवर्ण नेता नीतीश कुमार के भावनाओं से खेलते रहे हैं। जदयू के शुभचिंतकों को जुड़ने और खेलने शब्द के अंतर को समझना होगा। संजय झा नीतीश कुमार की भावनाओं से खेल रहे हैं। अन्य सवर्ण नेता भी संजय झा के साथ खड़े हैं। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि संजय झा के सुझाव पर कोईरी-कुर्मी-धानुक नेता ही समर्थन में खड़े हैं, जबकि सवर्ण रणनीतिक रूप से चुप बैठे हैं।
राजनीतिक शब्दों में कहें तो संजय झा ने जदयू का अपहरण कर लिया है। जैसे अपहृत जहाज का हर यात्री सहमा होता है, उसी तरह जदयू का हर सांसद, विधायक और मंत्री सहमे हुए हैं। संजय झा के खिलाफ बोलकर अपनी पारी समाप्त करने का जोखिम नहीं उठा रहे हैं। लेकिन सबसे बड़ा सवाल है कि जहाज रहेगा, तभी उम्मीद भी रहेगी।

