शराबबंदी ने बिहार को सुधारने के बजाय एक खतरनाक मोड़ पर ला खड़ा किया है, लेकिन कुछ लोगों को यह बात समझ ही नहीं आ रही
राम दुलार यादव
बिहार/अभी ताजा मामला अररिया के फारबिसगंज से सामने आया है और सच कहूं तो इस घटना ने अंदर तक हिला दिया है। यह सिर्फ एक हत्या नहीं है, यह उस खतरनाक बदलाव का संकेत है जो बिहार में चुपचाप पनप रहा है।
जानकारी साफ है कि दोनों साथ में गांजा पीते थे, वो भी बीएस डालकर, यानी ऐसा नशा जो सीधे दिमाग पर असर करता है। दो महीने पहले ही स्मैक केस में सत्तू वाला पकड़ा गया था, मतलब नशा उसकी जिंदगी का हिस्सा बन चुका था।
एक छोटा सा मज़ाक हुआ यै कि आज सत्तू वाली नहीं आई। . और उसके बाद जो हुआ, वो इंसानियत के नाम पर कलंक है। अनानास काटने वाले चाकू से गला रेत देना कोई सामान्य गुस्सा नहीं है, ये दिमाग का पूरी तरह से सुन्न हो जाना है। और दिमाग तब ही इस हद तक खत्म होता है जब उसमें नशे का जहर भर जाता है।
अब असली बात समझिए, बिहार में शराबबंदी के बाद शराब खत्म नहीं हुई, उसका रास्ता बदल गया। शराब की जगह गांजा, स्मैक, ब्राउन शुगर और इंजेक्शन वाला नशा तेजी से बढ़ा है। युवा तो कफ सिरप भी पी रहे हैं। सीमावर्ती जिलों में नेपाल और बंगाल के रास्ते ड्रग्स की सप्लाई आसान हो गई है और युवाओं के बीच “सूखा नशा” तेजी से फैल रहा है, जो शराब से कई गुना ज्यादा खतरनाक है। लगातार ऐसे मामले सामने आ रहे हैं जो बताते हैं कि नशा बंद नहीं हुआ, बल्कि और जहरीला हो गया है।
पिछले कुछ सप्ताह के अंदर करोड़ो रुपए के कफ सिरप और स्मैग को पुलिस ने बरामद किया है।
सच्चाई यही है कि नशा कभी बंद नहीं होता, वो सिर्फ अपना रूप बदलता है। आप शराब बंद कर दीजिए, इंसान गांजा ढूंढ लेगा, गांजा बंद कर दीजिए तो स्मैक आ जाएगा। समस्या शराब नहीं है, समस्या नशे की आदत और सिस्टम की विफलता है।
दुनिया इस सच्चाई को बहुत पहले समझ चुकी है। कई देशों ने शराबबंदी लागू की और फिर उसे वापस लेना पड़ा क्योंकि अपराध बढ़े, अवैध तस्करी बढ़ी और समाज ज्यादा बिगड़ा। लेकिन हम आज भी उसी जिद में फंसे हुए हैं।
क्योंकि उनके करियर को सुखे नशे ने बर्बाद कर दिया था। अब सोचिए, एक ऐसा आदमी जिसने खुद नशे की दुनिया देखी है, वो यह चेतावनी दे रहा है, लेकिन नीति बनाने वाले इसे समझने को तैयार नहीं हैं।
आज बिहार के गांव-गांव में शराब नहीं, जहर घूम रहा है और ये जहर इंसान को शराबी नहीं, सीधे दरिंदा बना रहा है। अब भी समय है कि जिद छोड़कर हकीकत को स्वीकार किया जाए, नहीं तो ऐसे फारबिसगंज जैसे मामले आगे और बढ़ेंगे।

