बिहार

नीतीश कुमार जा रहे हैं उन्होंने विधानपरिषद से इस्तीफ़ा दिया

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कृष्णा कुमार 

पटना /कुछ बिहारी उनके इस विदाई से इमोशनल लहालोट हो रहे हैं। ऐसे लोग स्टॉकहोम सिंड्रोम से ग्रसित हैं। स्टॉकहोम सिंड्रोम एक मनोवैज्ञानिक प्रतिक्रिया है, जिसमें शोषण का शिकार व्यक्ति अपने उत्पीड़क के प्रति सहानुभूति, प्यार या वफादारी विकसित कर लेता है। ये वैसा ही है जैसे वर्षों तक एक ही खूंटे से बंधने के बाद पालतू पशुओं को उस खूंटे की आदत हो जाती है और रस्सी खोल देने के बावजूद वो छोड़कर नहीं जा पाते। अक्सर वर्षों तक नचाने वाले मदारी से पोसुआ बंदर, भालू को भी लगाव हो जाता है। अक्सर वर्षों तक लाठी खाने के बावजूद गधे को भी अपना मालिक ही सही लगता है।

नीतीश कुमार पिछले 21 वर्षों से बिहार को खूंटे से बांधे हुए थे। पहले पांच वर्षों को छोड़ दें तो उनके मुख्यमंत्री काल के अगले 16 वर्षों में कोई एक अचीवमेंट ऐसी नहीं रही जिनके लिए उन्हें याद किया जाएगा। 21 साल पहले उन्होंने कहा की बिहार में जंगलराज है, गरीबी है, पलायन है, बेरोजगारी है, कुव्यवस्था है, भ्रस्टाचार है, अपराध है। उन्होंने कहा की इसे हटाना होगा, हम ही हटाएंगे। सुशासन लाना होगा, हमें मौका दीजिए। हमने मान लिया। और आगे हर चुनाव में मानते चले गए।

लेकिन आज 21 साल बाद पलट के देखिए तो क्या बदला है

बिहार तब भी देश का सबसे गरीब-पिछड़ा राज्य था, आज भी है।बिहारी तब भी शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार के लिए पलायन कर रहे थे, आज भी कर रहे हैं। बिहार के चीनी मील, पेपर मील, सूत मील, जुट मील, खाद मील समेत तमाम पुराने उद्योग-मील बंद पड़े थे, आज भी बंद पड़े हैं। शिक्षा का हाल बुरा था, आज भी वहीं है। स्वास्थ्य सुविधा में स्थिति वैसा ही है। अपराध में बिहार अव्वल था। हत्या, चोरी, बलात्कार, अपहरण आदि रोजाने की घटनाएं थी। आज भी है। बिहार एक बीमार राज्य माना जाता था। दूसरे राज्यों में बिहारी शब्द एक गाली जैसे प्रयुक्त होता था, पलायन करके गए लोगों को वहाँ गाली, मार, अपमान सहना पड़ता था। क्या आज नहीं है ।

तो पिछले 21 वर्षों में बदला क्या ? न शिक्षा बेहतर हुआ न स्वास्थ्य, न गरीबी हटी न अपराध, न पलायन कम हुआ न बिहारियों का शोषण।

नीतीश कुमार उस वक्त बिहार के मुख्यमंत्री थे जब शेष भारत सहित पूरी दुनिया बदल गई। रेडियो के जमाने में कुर्सी पर बैठे नीतीश कुमार AI के जमाने में पद छोड़ रहे हैं। इन 21 सालों में सब कुछ बदल गया। बस नहीं बदल पाया तो बिहार की स्थिति, नियति और भाग्य।

नीतीश कुमार के जाने की खुशी मनाइए, बधाई लीजिए, मिठाई बांटिए। शोक मत मनाइए। नीतीश बिहार के लिए खूंटा थे, दीवार थे, ताला थे। नीतीश का जाना बिहार के भाग्य के लिए बेहतर है। अब बिहार में नवनेतृत्व का रास्ता खुलेगा। कुछ दिन अस्थिरता रह सकती है, लेकिन फिर इसी अंधेरे से बिहार का सूर्य निकलेगा।