बिहार में गैस संकट से मचा हाहाकार सड़कों पर उतरी जनता
राम दुलार यादव के कलम से
बिहार की सरज़मीन इन दिनों एक नए संकट से जूझ रही है। यह संकट सिर्फ रसोई गैस की किल्लत का नहीं, बल्कि आम आदमी की जिंदगी पर पड़े उस बोझ का है जो दिन-प्रतिदिन भारी होता जा रहा है। रसोई गैस, जो कभी गरीब और मध्यम वर्ग के घरों में सहूलियत का जरिया बनी थी, आज वही गैस लोगों के लिए मुसीबत बन गई है। आज हालात यह हैं कि कई घरों में चूल्हा ठंडा पड़ा है। माँएं और बहनें सिलेंडर की खाली टंकी को देखकर सोच में डूबी हैं कि आखिर खाना कैसे बनेगा? गरीब मजदूर, रिक्शा चलाने वाला, दिहाड़ी करने वाल सबके चेहरे पर एक ही सवाल है…..
क्या अब बिना खाए-पिए ही दिन काटने होंगे? बिहार के कई शहरों और कस्बों से खबरें आ रही हैं कि गैस की भारी किल्लत है। लोग घंटों-घंटों एजेंसी के बाहर लाइन में खड़े रहते हैं, लेकिन जब उनकी बारी आती है तो जवाब मिलता है सिलेंडर खत्म हो गया।सवाल यह है कि आखिर यह सिलेंडर जाते कहाँ हैं? क्या यह सारा खेल काले बाज़ार का है? क्या कुछ लोग जनता की मजबूरी को मुनाफे में बदल रहे हैं? लोगों का आरोप है कि बाजार में खुलेआम ब्लैक मार्केटिंग हो रही है। जो सिलेंडर सरकारी दर पर मिलना चाहिए, वही कई जगह दोगुनी कीमत पर बेचा जा रहा है। गरीब आदमी मजबूर होकर अपनी जेब खाली कर देता है, क्योंकि घर में बच्चे भूखे बैठे होते हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि इस पूरे हालात के लिए जिम्मेदार कौन है? जनता पूछ रही है कि आखिर प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री इस मुद्दे पर खामोश क्यों हैं? क्या उन्हें बिहार के गरीबों की तकलीफ दिखाई नहीं दे रही? क्या उन्हें उन घरों का दर्द महसूस नहीं होता जहाँ चूल्हा ठंडा है और बच्चे भूख से बिलख रहे हैं? बिहार की सड़कों पर अब लोगों का गुस्सा दिखाई देने लगा है।
कई जगहों पर लोग विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। उनका कहना है कि अगर जल्द ही इस समस्या का समाधान नहीं हुआ, तो यह गुस्सा एक बड़े आंदोलन का रूप ले सकता है। रसोई गैस कोई विलासिता की चीज नहीं है, बल्कि आज के दौर में यह हर घर की बुनियादी जरूरत बन चुकी है। जब यही जरूरत पूरी नहीं हो पा रही, तो यह साफ संकेत है कि कहीं न कहीं व्यवस्था में बड़ी खामी है। सरकार को चाहिए कि तुरंत इस मामले की जांच कराए, ब्लैक मार्केटिंग पर सख्त कार्रवाई करे और यह सुनिश्चित करे कि हर जरूरतमंद तक रसोई गैस सही कीमत पर पहुंचे। क्योंकि अगर जनता का सब्र टूट गया, तो यह सिर्फ गैस का मुद्दा नहीं रहेगा, बल्कि यह आम आदमी की इज्जत और उसके हक की लड़ाई बन जाएगा। आज बिहार की जनता बस यही पूछ रही है क्या हमारे घरों के चूल्हे यूँ ही ठंडे रहेंगे? या कोई हमारी आवाज़ सुनेगा।

