बिहार

जिस प्लास्टिक को समझते थे कचरा , अब उसी से बन रहीं मजबूत ग्रामीण सड़कें ।। 2.अब नहीं चलेगी ढिलाई, दो साल में हर हाल में पूरा होगा विशेष भूमि सर्वेक्षण : विजय सिन्हा ।। 3.कचरा नहीं कमाल: जलकुंभी से मखाने की खेती में क्रांति

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पटना/घर-घर से निकलने वाला सिंगल यूज प्लास्टिक अब कचरे का हिस्सा न होकर ग्रामीण सड़कों की मजबूती बढ़ा रहा है। यह लाइलाज समस्या नहीं, बल्कि ग्रामीण सड़क निर्माण का महत्वपूर्ण अवयवों में शामिल हो गया है। यह सफलता ग्रामीण विकास विभाग की ओर से चलाए गए लोहिया स्वच्छ बिहार अभियान (एलएसबीए) के तहत डोर-टू-डोर कचरा कलेक्शन के बाद मिली है। ग्रामीण कार्य विभाग के सहयोग से घरों से निकलने वाले प्लास्टिक कचरे का प्रसंस्करण कर राज्य के तीन जिलों में करीब 10 किलोमीटर लंबी सड़क बनाई जा चुकी है। आने वाले समय में अन्य जिलों में भी इस नवाचार को लागू करने की योजना चल रही है।

ग्रामीण विकास विभाग की ओर से चलाए जा रहे लोहिया स्वच्छ अभियान के तहत ग्रामीण क्षेत्रों में डोर-टू-डोर कचरे का कलेक्शन किया जा रहा है। इस कचरे में शामिल घरों से निकलने वाले सिंगल यूज प्लास्टिक को राज्य में स्थापित कुल 171 प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन इकाई पर पहुंचाया जा रहा है। इन इकाइयों पर प्लास्टिक का प्रसंस्करण कर वेस्ट को ग्रामीण कार्य विभाग को दिया जा रहा है। ग्रामीण कार्य विभाग इस वेस्ट को तारकोल के साथ मिलाकर गांवों में मजबूत और टिकाऊ सड़क का निर्माण कर रहा है। अभी तक राज्य के प्रमुख तीन जिलों पूर्णिया, खगड़िया और औरंगाबाद में करीब 8 मीट्रिक टन प्लास्टिक अवशेष से 10.5 किलोमीटर लंबी सड़कों का निर्माण किया जा चुका है। आने वाले समय में अन्य दूसरे जिलों में भी प्लास्टिक अवशेष से कई गुना टिकाऊ और दीर्घकालिक सड़क बनाने की योजना है।

पर्यावरण भी सुरक्षित, सड़कें भी मजबूत

खगड़िया, सड़क की लंबाई-01 किमी, उपयोग प्लास्टिक अपशिष्ट- 01 मीट्रिक टन
पूर्णिया, सड़क की लंबाई-4.05 किमी, उपयोग प्लास्टिक अपशिष्ट-3.08 मीट्रिक टन
औरंगाबाद, सड़क की लंबाई- 5 किमी, उपयोग प्लास्टिक अपशिष्ट-3.5 मीट्रिक टन

स्वच्छता से सड़क तक की कहानी

लोहिया स्वच्छ बिहार अभियान में ठोस एवं तरल अपशिष्ट प्रबंधन के राज्य सलाहकार रतनीश वर्मा बताते हैं कि कम व उच्च घनत्व वाले प्लास्टिक, पेट बोतल आदि की कतरन को गर्म डामर के साथ 7 प्रतिशत के अनुपात में मिलाया जाता है। इससे बनने वाली सड़कों की गुणवत्ता काफी अधिक होती है। इसकी एक मुख्य वजह यह है कि इन सड़कों पर जल जमाव से कोई नुकसान नहीं होता। इसी वजह से इनकी आयु पारंपरिक सड़कों की अपेक्षा कई गुना बढ़ जाती है। उन्होंने बताया कि अभियान प्लास्टिक प्रबंधन और पर्यावरण सुरक्षा की दिशा में एक विशिष्ट पहल है।

कोट में…...
पर्यावरण सुरक्षा और टिकाऊ बुनियादी ढांचे के लिए प्लास्टिक कचरे का इस्तेमाल ग्रामीण सड़कों के निर्माण में किया जा रहा है। इसका उद्देश्य जलजमाव वाले क्षेत्रों में सड़कों को अधिक मजबूत बनाना है। साथ ही प्लास्टिक कचरे का सही निष्पादन करते हुए पर्यावरण प्रदूषण को कम करना है। आने वाले समय में दूसरे जिलों में भी प्लास्टिक अवशेष से निर्मित मजबूत और टिकाऊ सड़क बनाने की योजना है। इसे जल्द ही लागू किया जाएगा।

2.अब नहीं चलेगी ढिलाई, दो साल में हर हाल में पूरा होगा विशेष भूमि सर्वेक्षण : विजय सिन्हा

उपमुख्यमंत्री सह राजस्व एवं भूमि सुधार मंत्री श्री विजय कुमार सिन्हा ने विभागीय कार्यालय कक्ष में राज्य में चल रहे विशेष भूमि सर्वेक्षण कार्यों की विस्तृत समीक्षा की। समीक्षा के दौरान उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री श्री नीतीश कुमार द्वारा वर्ष 2011 में घोषित बिहार विशेष भूमि सर्वेक्षण को आगामी दो वर्षों में पूर्ण कराने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए संबंधित अधिकारियों को प्रत्येक जिले में तय समय-सीमा के अनुसार कार्य का विस्तृत रिपोर्ट शीघ्र प्रस्तुत करने का निर्देश दिया गया।
उपमुख्यमंत्री ने स्पष्ट निर्देश दिया कि सर्वे कार्य पूर्ण पारदर्शिता और समयबद्धता के साथ संपन्न हो, ताकि आम जनता को इसका वास्तविक लाभ शीघ्र मिल सके। उन्होंने कहा कि किसी भी स्तर पर लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी। सर्वे का उद्देश्य केवल इसे पूरा करना नहीं, बल्कि आम लोगों की वास्तविक समस्याओं की पहचान कर उनका समाधान सुनिश्चित करना है।
उन्होंने कहा कि किसी प्रकार की गलती की शिकायत पर तत्काल आवश्यक कार्रवाई की जाएगी। जहां भी त्रुटि या अनावश्यक विलंब पाया जाएगा, वहां संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाएगी। मंत्री ने दो टूक कहा कि सर्वे औपचारिकता नहीं, बल्कि सुधार का आधार बने। गलत रिपोर्टिंग या मनमानी की स्थिति में कड़ी प्रशासनिक और कानूनी कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने आम नागरिकों से अपील की कि किसी भी प्रकार की गड़बड़ी की जानकारी लिखित रूप में विभाग को दें। इसपर तत्काल कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी।
समीक्षा बैठक में प्रधान सचिव श्री सीके अनिल और सचिव श्री जय सिंह ने वर्षों पूर्व हुए कैडेस्ट्रल एवं रिवीजनल सर्वे की जानकारी देते हुए नए सर्वे से होने वाले लाभों पर प्रकाश डाला।
भू-अभिलेख एवं परिमाप निदेशालय के निदेशक श्री सुहर्ष भगत ने सर्वे की वर्तमान स्थिति और विलंब के कारणों की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि तकनीकी मार्गदर्शिका का समय पर निर्माण न होने से प्रारंभिक चरण में कार्य प्रभावित हुआ। यह मार्गदर्शिका मार्च 2019 में अधिसूचित हुई। प्रथम चरण के 20 जिलों के 89 अंचलों में विशेष सर्वेक्षण कर्मियों की समय पर नियुक्ति नहीं होने से दिसंबर 2021 में शुरू कार्य को अपेक्षित गति नहीं मिल सकी। बाद में शेष अंचलों तथा 18 जिलों के सभी अंचलों में सर्वे कार्य सितंबर 2024 से प्रारंभ किया गया। फील्ड में राजस्व संबंधी जटिलताओं के समाधान हेतु दिसंबर 2024 में 16 बिंदुओं पर विभागीय मार्गदर्शन भी अधिसूचित किया गया।
प्रगति की जानकारी देते हुए उन्होंने बताया कि प्रथम चरण में 20 जिलों के 89 अंचलों के 5657 राजस्व ग्रामों में ऑथोफोटोग्राफ, ग्रामस्तरीय उद्घोषणा और ग्राम सभा का कार्य शत-प्रतिशत पूरा हो चुका है। किस्तवार कार्य 99.92 प्रतिशत, खानापुरी 94.4 प्रतिशत तथा प्रपत्र-6 का कार्य लगभग 79 प्रतिशत ग्रामों में पूर्ण है। 67 प्रतिशत ग्रामों में प्रारूप अधिकार अभिलेख प्रकाशित किए जा चुके हैं, जबकि 31 प्रतिशत ग्रामों में अंतिम अधिकार अभिलेख प्रकाशित हो चुके हैं। इनमें से 912 ग्रामों के अभिलेखों को अधिसूचित भी किया जा चुका है।
द्वितीय चरण में 36 जिलों के 444 अंचलों के 37 हजार 419 राजस्व ग्रामों में हवाई सर्वेक्षण, ऑथोफोटोग्राफ, ग्रामस्तरीय उद्घोषणा और ग्राम सभा का कार्य पूरा कर लिया गया है। रैयतों से 2.70 करोड़ से अधिक स्वघोषणाएं प्राप्त हुई हैं। लगभग 98.81 प्रतिशत ग्रामों में प्रपत्र-5 का कार्य पूर्ण हो चुका है। साथ ही त्रि-सीमाना निर्धारण और ग्राम सीमा सत्यापन का कार्य भी प्रगति पर है।

 

 

3.कचरा नहीं कमाल: जलकुंभी से मखाने की खेती में क्रांति

बिहार के किसान जैविक खेती की ओर तेजी से रुख कर रहे हैं। वे खुद से जैविक खाद भी तैयार करने में जुटे हैं। सहरसा जिले के मुरादपुर पंचायत में किसानों ने एक अनोखा प्रयोग शुरू किया है। पोखरों और तालाबों में उगने वाली जलकुंभी को लोग पहले समस्या मानकर फेंक देते थे। अब उसी से उच्च गुणवत्ता वाली वर्मी कम्पोस्ट बनाई जा रही है। यह खाद विशेष रूप से मखाना की खेती में इस्तेमाल की जा रही है।

पंचायत के मुखिया राहुल झा ने बताया कि इस क्षेत्र में मखाना बड़े पैमाने पर उगाया जाता है। इसके लिए जलकुंभी का खाद उपयोग किया जा रहा है।

पिछले करीब एक साल से पंचायत की वेस्ट प्रोसेसिंग यूनिट में जलकुंभी से खाद बनाने का काम चल रहा है। बीते दो महीनों में ही लगभग 500 किलोग्राम खाद तैयार की जा चुकी है। रोजाना करीब 20 किलोग्राम खाद बन रही है। इसमें पंचायत के करीब 15 परिवार खासकर महिलाएं सक्रिय रूप से शामिल हैं। वे खाद को अपने मखाना की खेती में इस्तेमाल भी कर रहे हैं। इससे उन्हें रासायनिक खाद खरीदने की जरूरत कम हुई है और उत्पादन में भी अच्छी बढ़ोतरी देखी जा रही है।

उन्होंने आगे बताया कि खाद तैयार करने के लिए सबसे पहले जलकुंभी को पानी से निकालकर छोटे-छोटे टुकड़ों में काटा जाता है। इसे गोबर के साथ अच्छी तरह मिलाया जाता है। मिश्रण को लगभग 45 दिनों तक छांव में सुखाया जाता है।
इस दौरान इसमें केंचुए छोड़ दिए जाते हैं, जो इसे वर्मीकम्पोस्ट में बदल देते हैं।
यह जैविक खाद पंचायत के किसानों को मुफ्त में उपलब्ध हो रही है। आगे इसे बड़ी मात्रा में तैयार कर किसानों को बाजार उपलब्ध कराया जाएगा।

इस खाद में नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटैशियम के अलावा मैग्नीशियम, आयरन, मैग्नीज, जिंक जैसे पोषक तत्व भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं। इससे मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है, फसल की लागत कम होती है और मखाना का उत्पादन बेहतर होता है।