बलीराजगढ़ कांड वर्दी का दाग और 3 दिन की खामोशी क्या कानून वर्दी देखकर झुक जाता है
रिपोर्ट: कृष्णा कुमार
मधुबनी/बाबूबरही के बलीराजगढ़ में 3 अक्टूबर की रात जो हुआ वो सिर्फ एक अपराध नहीं, वर्दी पर लगा एक बदनुमा दाग है। आरोप है कि मधुबनी पुलिस के एक एएसआई ने ही गोली चलाई, एक की जान ले ली, तीन को घायल कर दिया और एक नाबालिग के साथ दुष्कर्म की कोशिश की।पर उससे भी बड़ा अपराध उसके बाद शुरू हुआ तीन दिन तक गिरफ्तारी नहीं FIR दर्ज करने में देरी और प्रशासन की चुप्पी।
हम पूछना चाहते हैं मधुबनी पुलिस अधीक्षक से और बिहार सरकार से अगर आरोपी ASI की जगह कोई आम नागरिक होता तो क्या 72 घंटे तक वह खुला घूमता ।क्या उसका घर अब तक कुर्क नहीं हो गया होता। तो फिर इस मामले में इतनी नरमी क्यों।
स्थानीय लोगों का शक बेबुनियाद नहीं है। जब जनता कह रही है कि नीचे से लेकर ऊपर तक सब मिले हुए हैं तो यह व्यवस्था पर से भरोसा उठने की आखिरी घंटी है। पुलिस का पूरा तंत्र लगा है, ऐसा कहा जा रहा है लेकिन गिरफ्तारी शून्य है। 25 हजार का इनाम घोषित करना कार्रवाई नहीं खानापूर्ति है।
देर से FIR लिखना अपने आप में एक बड़ा सबूत है कि शुरुआत से ही इस केस को दबाने घुमाने की कोशिश हुई। क्या किसी बड़े अधिकारी के इशारे पर यह देरी हुई। क्या ASI को भागने का मौका दिया गया।
मधुबनी के लोगों ने हमेशा पुलिस को अपना रक्षक माना है। लेकिन जब रक्षक ही भक्षक बन जाए और जिला प्रशासन उसे बचाने में लग जाए तो जनता किसके पास जाएगी।आरोपी ASI को तुरंत गिरफ्तार करो, बर्खास्त करो। देर से FIR करने वाले बाबूबरही थानाध्यक्ष पर कार्रवाई करो। नाबालिग पीड़िता की पहचान गुप्त रखकर उसे सुरक्षा और न्याय दो।
याद रखिए, बलीराजगढ़ का यह मामला सिर्फ एक गांव का नहीं पूरे बिहार के पुलिसिया इकबाल का टेस्ट है। अगर इसमें भी न्याय नहीं मिला, तो लोगों का यही मानना पक्का हो जाएगा कि बिहार में दो कानून हैं एक आम आदमी के लिए, दूसरा वर्दी वालों के लिए।

