अनंत सिंह के बगावती तेवर के समक्ष जदयू के कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा का सरेंडर
न्यूज डेस्क
बिहार की राजनीति में इन दिनों जदयू के अंदर चल रही सियासी खींचतान चर्चा का विषय बनी हुई है। खासकर मोकामा से जदयू विधायक अनंत सिंह के बगावती तेवरों के बाद पार्टी नेतृत्व के रुख पर सवाल उठ रहे हैं।एक तरह से आप कह सकते हैं कि अनंत सिंह के बागी तेवर के समक्ष पूरी जदयू पार्टी ने सरेंडर कर दिया है।
अनंत सिंह 1 अक्टूबर को दूसरी पार्टी जन सुराज के प्रत्याशी अनुज सिंह के नामांकन में शामिल हुए। वह सिर्फ नामांकन में शामिल ही नहीं हुए, बल्कि पहले से ही ऐलान कर चुके हैं कि वह हर हाल में जदयू उम्मीदवार के खिलाफ खड़े जन सुराज के उम्मीदवार अनुज सिंह के साथ रहेंगे और उनके लिए घूम-घूमकर वोट मांगेंगे। उनकी इस भूमिका की रिपोर्टिंग कई मीडिया संस्थानों ने भी की है।नामांकन के दौरान अनंत सिंह खुली जीप में अनुज सिंह के साथ नजर आए और बड़ी संख्या में समर्थकों के साथ नामांकन के लिए पहुंचे। रिपोर्टों के मुताबिक, इस दौरान बड़ी भीड़ मौजूद थी और अनंत सिंह ने जन सुराज प्रत्याशी के समर्थन में खुलकर अपनी भूमिका निभाई।
इतना ही नहीं नामांकन से पहले अनंत सिंह की ओर से समर्थकों के लिए बड़ी मात्रा में रसगुल्ले की व्यवस्था किए जाने की भी खबर सामने आई। मीडिया रिपोर्टों में 50 हजार रसगुल्ले तैयार कराने की बात कही गई।यानी तस्वीर बिल्कुल साफ है—एक तरफ जदयू का अपना उम्मीदवार चुनाव मैदान में है और दूसरी तरफ उसी पार्टी के मौजूदा विधायक अनंत सिंह खुलकर दूसरी पार्टी के उम्मीदवार के समर्थन में खड़े नजर आ रहे हैं।
इसके बाद अब जदयू के कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा का यह कहना कि इस मसले को ललन सिंह देखेंगे, राजनीतिक तौर पर कई सवाल खड़े करता है।
सवाल यह है कि आखिर पार्टी का अनुशासन किसके लिए है।संगीता यादव पर कार्रवाई अनंत सिंह पर इंतजार क्यों।
यही सवाल तब और बड़ा हो जाता है जब सिवान की जदयू नेता और जिला परिषद अध्यक्ष संगीता यादव का मामला सामने आता है।संगीता यादव जदयू की प्रदेश सचिव भी थीं। उनके पति प्रो. जयराम यादव को राजद ने सारण शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से अपना उम्मीदवार बनाया। इसके बाद जब जयराम यादव अपने घर पहुंचे तो संगीता यादव ने उनका आरती उतारकर स्वागत किया।
इसके बाद जदयू ने संगीता यादव के खिलाफ कार्रवाई करते हुए उन्हें छह वर्षों के लिए पार्टी से निष्कासित कर दिया। हालांकि पार्टी के निष्कासन पत्र में औपचारिक आधार “पार्टी विरोधी गतिविधियों में संलिप्तता” बताया गया था।
यहीं से सवाल खड़ा होता है
जब पार्टी अपने एक प्रदेश सचिव और जिला परिषद अध्यक्ष के खिलाफ इतनी तेजी से कार्रवाई कर सकती है, तो दूसरी पार्टी के उम्मीदवार के साथ खुलेआम खड़े होकर उसका समर्थन करने वाले अपने ही विधायक के मामले में फैसला लेने में इतनी देरी क्यों।
छोटू सिंह का मामला भी सवालों के घेरे में
इसी संदर्भ में छोटू सिंह का मामला भी चर्चा में आता है। आपके उठाए सवाल के मुताबिक, जिस राजनीतिक घटनाक्रम में अनंत सिंह के साथ छोटू सिंह भी मौजूद थे, उस समय उनके खिलाफ भी पार्टी स्तर पर कार्रवाई की गई थी।
अब सवाल यह है कि अगर पार्टी अनुशासन के नाम पर पहले कार्रवाई कर चुकी है, तो आज उसी तरह के सवाल अनंत सिंह के मामले में उठने के बावजूद पार्टी नेतृत्व का रुख इतना अलग क्यों दिखाई दे रहा है?
क्या अनंत सिंह के सामने जदयू नेतृत्व बेबस है।यही इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल है।
एक तरफ जदयू का आधिकारिक उम्मीदवार नीरज कुमार पटना स्नातक सीट से चुनाव मैदान में है। दूसरी तरफ जदयू विधायक अनंत सिंह ने जन सुराज उम्मीदवार अनुज सिंह के समर्थन का ऐलान किया और उनके नामांकन में खुलकर शामिल हुए।
इसके बावजूद अभी तक पार्टी की तरफ से अनंत सिंह के खिलाफ किसी तत्काल निष्कासन की घोषणा सामने नहीं आई है। जदयू की ओर से यह कहा गया है कि घटनाक्रम की जानकारी पार्टी नेतृत्व को दी गई है और उचित समय पर कार्रवाई की जा सकती है।
ऐसे में राजनीतिक गलियारों में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या अनंत सिंह के सामने जदयू का अनुशासन बौना साबित हो गया है।क्या पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष, प्रदेश अध्यक्ष, कार्यकारी अध्यक्ष और अनुशासन समिति के लिए अलग-अलग नेताओं के मामले में अलग-अलग पैमाने हैं।
संगीता यादव के मामले में कार्रवाई और अनंत सिंह के मामले में इंतजार—इन दोनों घटनाक्रमों की तुलना ने जदयू के भीतर अनुशासन को लेकर बहस जरूर तेज कर दी है।
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही हैं
अनंत सिंह के बागी तेवरों के सामने जदयू कब फैसला लेगा? या फिर संजय झा के शब्दों में यह मामला ललन सिंह के पास ही जाता रहेग।

