भगवान कृष्ण पर अपशब्द और बागेश्वर की मर्यादा – क्या साधु का यही धर्म है
संपादक: राम दुलार यादव
देश में इन दिनों एक बयान ने भूचाल ला दिया है। खुद को साधु, संत और बागेश्वर धाम का पीठाधीश्वर कहने वाले व्यक्ति द्वारा भगवान श्रीकृष्ण के प्रति अपशब्दों का प्रयोग किया जाना, अत्यंत निंदनीय और दुर्भाग्यपूर्ण है।
सवाल सीधा है – आखिर बागेश्वर ने ऐसा क्यों कहा
भगवान श्रीकृष्ण कोई एक धर्म के नहीं बल्कि करोड़ों हिंदुओं की आस्था, प्रेम और गीता के ज्ञान के प्रतीक हैं। दुनिया का हर धर्म जानता है कि कृष्ण क्या हैं। ऐसे में खुद को भगवान का सेवक बताने वाला व्यक्ति ही अगर कृष्ण का अपमान करे, तो यह साधुता नहीं, सबसे बड़ी जुमलेबाजी है।
क्या यह राजनीतिक दबाव में दिया गया बयान है
अक्सर देखा गया है कि सुर्खियों में बने रहने के लिए भगवानों के नाम पर बयानबाजी की जाती है। यदि यह भी उसी हीरो बनने की होड़ का हिस्सा है तो यह और भी शर्मनाक है। भगवान के नाम पर लोगों को बांटना, भड़काना और अपनी दुकान चलाना किसी संत का काम नहीं हो सकता।
अपने आप को धरती पर भगवान मानने वाले लोग जब दूसरे भगवान का अपमान करते हैं, तो वे लोगों को गुमराह ही नहीं, बल्कि सनातन की जड़ों पर प्रहार करते हैं।
अब जनता का सब्र टूट रहा है
यही कारण है कि देश के कई हिस्सों में लोगों का आक्रोश फूट पड़ा है। कहीं धरना-प्रदर्शन हो रहा है, कहीं पुतला दहन। यह आक्रोश इस बात का सबूत है कि आस्था के साथ खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
हमारा मानना है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मतलब आस्था का अपमान नहीं है। जो व्यक्ति भगवान पर अपशब्द कहकर समाज में नफरत फैलाए उस पर कानून के तहत कठोर कार्रवाई होनी चाहिए।
बागेश्वर धाम जैसे बड़े पीठ से जुड़े व्यक्ति को तो और भी मर्यादा में रहना चाहिए। साधु का काम जोड़ना होता है, तोड़ना नहीं। हिंदू को बांटने का काम बंद होना चाहिए।
भगवान का अपमान करने वाला कोई सच्चा साधु-संत नहीं हो सकता। अगर आरोप सही हैं तो ऐसे व्यक्ति को दंडित किया जाना ही धर्म और देश दोनों के हित में होगा।

