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चीनी यात्री ह्वेनसांग के जीवन से शिक्षा लेने पहुँचे छात्र

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रिपोर्ट:धर्म प्रकाश रुद्र

नालन्दा / नव नालंदा महाविहार सम विश्वविद्यालय नालंदा में आयोजित वार्षिक खेल प्रतियोगिता तथा पीजी डिप्लोमा विपश्यना एवं योग का इंटरनल एग्जाम के बाद योग एवं विपश्यना के शिक्षक डॉ रंजीत सिंह एवं शिक्षिका डॉ अनुजा ने अपने विभाग के छात्र एवं छात्राओं को ह्वेनसांग मेमोरियल हॉल का परिभ्रमण कराया जहां पहुंच कर छात्र एवं छात्राओं ने ह्वेनसांग के जीवन की गहराइयों को काफी गंभीरता से समझा एवं परिसर का भ्रमण करते हुए कई ऐतिहासिक जानकारी प्राप्त किए ।
इस अवसर पर डॉक्टर अनुजा ने बताया कि ह्वेनसांग ने चीन में बौद्ध ग्रंथों का अध्ययन करते समय पाया कि विभिन्न अनुवादों में कई विरोधाभास और विसंगतियां थीं। उन्होंने उन कमियों को केवल स्वीकार नहीं किया, बल्कि सत्य को जानने की तीव्र इच्छा (जिज्ञासा) के कारण बौद्ध धर्म के मूल स्रोत भारत आने का साहसिक निर्णय लिया। चीन के तांग राजवंश ने विदेश यात्रा पर प्रतिबंध लगा रखा था। इसके बावजूद, ह्वेनसांग ने अपने लक्ष्य को नहीं छोड़ा। उन्होंने खतरनाक गोबी रेगिस्तान, बर्फीले पहाड़ों और डाकुओं के खतरों का सामना करते हुए अकेले ही भारत की यात्रा की। कई बार वे प्यास से मरने की कगार पर पहुंचे, लेकिन पीछे नहीं मुड़े।
ह्वेनसांग का उद्देश्य केवल अपने लिए ज्ञान प्राप्त करना नहीं था। भारत में 16 साल बिताने और अतुल्य ज्ञान अर्जित करने के बाद, वे सैकड़ों बौद्ध ग्रंथ और पांडुलिपियां लेकर वापस चीन लौटे। उन्होंने अपने जीवन के अंतिम वर्ष इन ग्रंथों का चीनी भाषा में अनुवाद करने में लगा दिए, ताकि आने वाली पीढ़ियां उससे लाभ उठा सकें और आज उन्हीं का कठिन परिश्रम तथा जीवन में कुछ भी ठान लेने के बाद उसे पूर्ण करने का संकल्प क्या होता है इसे गंभीरता से समझाने के उद्देश्य से छात्रों को यहां लाकर ह्वेनसांग मेमोरियल हॉल का परीभ्रमण कराया जा रहा है ताकि उनके जीवन से छात्र कुछ सीख सकें और पढ़ाई के बाद थोड़ा मानसिक तनाव से भी मुक्त हो सके इस उद्देश्य से आज छात्रों को यहां लाया गया है।

शिक्षक डॉक्टर रंजीत कुमार सिंह ने कहा कि आने वाले कुछ दिनों में हम नव नालंदा महाविहार के 76वें स्थापना दिवस समारोह का इसी परिसर में आयोजन होने वाला है आज छात्र एवं छात्राओं को ह्वेनसांग के जीवन को गंभीरता से समझने के उद्देश्य से हम यहां पहुंचे हैं इसके अलावा हम बगल में विपश्यना सेंटर भी चलाते हैं ।
उन्होंने बताया कि विपश्यना बुद्ध की ध्यान पद्धति है वि उपसर्ग है और पश्यना मतलब देखना होता है अर्थात विशेष रूप से देखने की क्रिया को विपश्यना कहते हैं जो योग को भी कहीं ना कहीं परिभाषित करता है आज बाहर के देशों में लोगों को स्लीपिंग पिल्स खानी पड़ रही है तब जाकर के लोग नींद ले पा रहे हैं वही भाग्यशाली यह देश है कि लोग यहां अच्छे से सो पाते हैं बाहर के लोग वैभव की ओर ज्यादा भागते हैं भौतिकवाद के भँवर में फंसते जा रहे हैं इस भौतिकतावाद को छुड़ाना ही योग है योग संस्कृत के युज् धातु से बना है जिसका मतलब है जोड़ना । उन्होंने बताया कि 13 अग्नि हमारे शरीर के अंदर है जिसमें से एक जठरागनी है इसके अलावा 7 धातुएं है और 3 दोष है इन चीजों पर अगर व्यक्ति पकड़ बना ले और इंद्रियों को बस में कर ले तो ही व्यक्ति पूर्णतः प्रसन्न हो सकता है और यह केवल योग से ही संभव है इसलिए बुद्ध के अष्टांगिक मार्ग एवं उनसे जुड़ी महत्वपूर्ण बातों को समझने एवं छात्रों में योग विपश्यना एवं शिक्षा के उद्देश्य से इस परिसर का परिभ्रमण छात्रों को कराया गया।