बिहार में यादवों के प्रति घृणा क्यों फैलाया जा रहा
संतोष कुमार सिंह
पटना/कुछ दिन पहले जीतनराम मांझी ने कहा था कि यादवों को या तो सुधर जाना चाहिए या बिहार छोड़ देना चाहिए। इधर जीतनराम मांझी नें अपने समधन और विधायक ज्योति मांझी के साथ स्थानीय लोगों के बहस के बाद वहाँ के स्थानीय दारोगा पर भड़के हुए हैं,दारोगा जी संयोगवश यादव जाति से ही हैं और यही कारण है कि जीतनराम मांझी भड़के हुए हैं। इसी मामले में 6 यादवों को SC/ST एक्ट लगाकर गिरफ़्तार भी किया गया है। दरअसल वे सभी लोग एक सबारी गाड़ी से अपने गांव के पगडंडी (कच्ची सड़क) से कहीं जा रहे थे कि उसी दौरान स्थानीय विधायक ज्योति मांझी अपने काफिले के साथ आ रही थी। सड़क संकरा होने के कारण ज्योति मांझी के अंगरक्षक अपने शक्ति वेजा इस्तेमाल एवं विधायकी का धौंस दिखाकर सबारी गाड़ी के चालक को पीटने लगा, जिसके कारण गाड़ी में सवार लोग उग्र हो गए थे। फिर दोनों पक्षों के बीच बहस हुई थी।अभी 2 दिन पहले ही जदयू के विधायक अजय कुशवाहा नें मीडिया को बयान दिया है कि बिहार के कुल अपराधियों में 50% यादव शामिल हैं, हालांकि इसका आधार क्या है वो उन्होंने नहीं बताया।
किसी भी जाति, धर्म में अच्छे और बुरे दोनों लोग होते हैं लेकिन बिहार में आये दिन एक जाति निशाने पर है, और वह है यादव।1990 के बाद आदरणीय लालू प्रसाद यादव जी के राज में जो जातियां यादवों के सहारे सशक्त हुई, जिस जाति के व्यक्ति को आज मुख्यमंत्री तक का कुर्सी मिला हुआ है, जिस जाति के लोग आज मंत्री बने घूम रहे हैं वैसे लोग भी यादवों पर बयानबाजी और हमले कर रहे हैं। पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर उनको अपराधी बता रहे हैं।
1990 में आदरणीय लालू प्रसाद यादव जी का उभार पिछड़ों का उभार था। आदरणीय लालू प्रसाद यादव नें बहुजन समाज से आने वाले हर जाति को अपने साथ 15 वर्ष तक कामोंबेश जोड़े रखा, लेकिन पिछड़े जाति के नेताओं की अति महत्वकांक्षाओं नें सामंतवादी शक्तियों का साथ लेकर उन्हें सत्ता से बाहर का रास्ता दिखा दिया।आज बिहार में यादवों के प्रति जो पूर्वाग्रह है, वो विशुद्ध राजनीतिक है। आज पिछड़े और अतिपिछड़े वर्ग के नेता, दलित और महादलित के नेता अपने क्षेत्र में अपने लोगों के बीच यादवों को गाली देकर मीडिया में सुर्खियां बटोर रहे हैं।उन लोगों को यही लगता है कि यादवों के बारे में बयानबाजी करके हम अपने लोगों में प्रसिद्ध हो जायेंगे, वो यह भूल जाते हैं कि आम यादवों का इससे कोई लेना देना नहीं है।आम यादव अपने रोजी-रोटी में व्यस्त है।
दरअसल 15 वर्षों का आदरणीय लालू प्रसाद यादव जी का शासन तथा वर्तमान में यादवों का विधानसभा ,संसद से लेकर सड़क तक मजबूत स्थान होना राजनीतिक घृणा का कारण है।यह घृणा सामाजिक न होकर सिर्फ राजनीतिक है। राजनीतिक लोग ऊपर से चाहते हैं कि यह घृणा सामाजिक हो ताकि इसे आधार बनाकर वो अपने कुनबे, दलित, महादलित और सवर्णों का वोट अपने तरफ कर सकें।
बिहार में यादवों की सामाजिक स्थिति किसी से छुपी नहीं है. यादवों की बड़ी आबादी आज दूसरे राज्यों में रोजगार के लिये पलायित है. बढ़ता परिवार और घटता भूमि का प्रभाव भी यादवों पर पड़ा है और ऐसे में इनके विरूद्ध राजनीतिक षड्यंत्र कर सामाजिक रूप से अलग-थलग करने की कोशिश है।
एकदिन मैंने SC/ST एक्ट के अंतर्गत दर्ज किये गए मुकदमों का अध्ययन किया जिसमें बड़ी संख्या में यादवों का नाम दर्ज है।ऐसे में बड़े पैमाने पर दर्ज मामले पर यादवों का बौद्धिक वर्ग भी चुप है। उन्हें डर खाए जा रहा कि इससे राजद को नुकसान न हो जाए। ऐसा लगता है जैसे पिछड़ा, अतिपिछड़ा,दलित,महादलित पिछले 35 वर्षों से राजद को ही वोट कर रहे हैं, जो वास्तव में दूर-दूर तक ऐसा नहीं है। दूसरी बात यह भी है कि ऐसे आधे से ज्यादा फर्जी केसेज पर बोलने से कौन सी बौद्धिकता का नाश हो जाएगा!
बिहार में बड़े पैमाने पर SC/ST एक्ट के तहत दर्ज मुकदमा विरोधियों द्वारा दलित-महादलित को उकसाकर करवाया जाता है।मैं ऐसे मामले को नज़दीक से जानता हूँ जिनमें लोगों को उकसाकर ऐसे झूठा मुकदमा करवाया गया है।फिर भी बौद्धिक वर्ग सत्य बोलने से क्यों बच रहे हैं ,पता नहीं।

