बड़ी खबरेबिहारशिक्षासंस्कृति

57 साल की उम्र में मंत्रिपद संभालते हुए क्लासरूम में कदम रखना निश्चित रूप से एक अनोखा नीतीश कुमार सरकार में ग्रामीण कार्य विभाग के मंत्री के रूप में सक्रिय

बिहार हलचल न्यूज ,जन जन की आवाज
Listen to this article

सुरेंद्र सिंह 

पटना/बिहार की राजनीति में अशोक चौधरी का नाम लंबे समय से जाना-पहचाना है। नीतीश कुमार सरकार में ग्रामीण कार्य विभाग के मंत्री के रूप में सक्रिय रहने वाले इस नेता ने अब एक नया अध्याय जोड़ दिया है। हाल ही में उन्होंने पटना के अनुग्रह नारायण कॉलेज (एएन कॉलेज) में राजनीति विज्ञान के सहायक प्राध्यापक के रूप में अपना पहला लेक्चर दिया। ५८ साल की उम्र में मंत्रिपद संभालते हुए क्लासरूम में कदम रखना निश्चित रूप से एक अनोखा घटनाक्रम है।

लेकिन इस खबर को देखकर कई सवाल स्वाभाविक रूप से उठते हैं। अशोक चौधरी ने बिहार राज्य विश्वविद्यालय सेवा आयोग की २०२० की परीक्षा पास की थी, जिसके आधार पर उनकी नियुक्ति हुई। पर सवाल ये है कि जब सैकड़ों युवा उम्मीदवार सालों से प्रोफेसर बनने की राह देख रहे हैं, तो एक सक्रिय मंत्री को यह पद मिलना कितना उचित है? क्या यह योग्यता का प्रमाण है या फिर सत्ता के प्रभाव का?

कहा जाता है कि उन्होंने सिलेबस पढ़कर तैयारी की और क्लास लेने से पहले थोड़ा नर्वस भी थे। पहला लेक्चर उन्होंने भारतीय संघीय व्यवस्था और केंद्र-राज्य संबंधों पर दिया। छात्रों ने उन्हें देखकर हैरानी जताई, क्योंकि जो नेता कभी मंत्रालय में फैसले लेते थे, आज वही चॉक पकड़कर पढ़ा रहे हैं। कुछ छात्रों ने तो मजाक में कहा भी कि सर, अब अटेंडेंस मार्किंग भी मंत्री स्तर की होगी क्या?

दरअसल, अशोक चौधरी का यह कदम कई मायनों में प्रतीकात्मक है। उन्होंने खुद कहा कि प्रोफेसर बनना उनके पिता का सपना था। लेकिन वास्तविकता ये है कि बिहार में शिक्षा व्यवस्था पहले से ही कई चुनौतियों से जूझ रही है। युवा शिक्षक नहीं मिल रहे, कॉलेजों में स्टाफ की कमी है, और यहां एक मंत्री को डबल ड्यूटी मिल गई। दिन में मंत्रालय संभालना और शाम को या खाली समय में क्लास लेना। क्या इससे छात्रों को कोई फायदा होगा या यह सिर्फ एक राजनीतिक इमेज बिल्डिंग का हिस्सा है।

बिहार कांग्रेस ने इस नियुक्ति पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि अशोक चौधरी को यह पद छोड़ देना चाहिए था, क्योंकि एक मंत्री के पास पहले से ही काफी जिम्मेदारियां हैं। कुछ लोग तो यह भी कह रहे हैं कि जब युवाओं को नौकरियां नहीं मिल रही हैं, तो ५८ साल में असिस्टेंट प्रोफेसर बनना थोड़ा अजीब लगता है। खासकर तब जब UGC की जांच भी इस मामले में हुई थी और नियुक्ति एक समय के लिए रोकी गई थी।

फिर भी, अशोक चौधरी का उत्साह देखने लायक है। उन्होंने कहा कि बहुत कम लोग मंत्री रहते हुए प्रोफेसर की क्लास लेना चाहेंगे। शायद यह उनकी जिज्ञासा का परिणाम है। लेकिन सच्चाई ये भी है कि राजनीति के मैदान से क्लासरूम तक का सफर आसान नहीं होता। पहले वोट मांगते थे, भाषण देते थे, अब छात्रों के सवालों का सामना करना पड़ेगा। अगर कोई छात्र पूछ बैठे कि सर, बिहार में शिक्षा क्यों पिछड़ रही है? या केंद्र-राज्य संबंधों में बिहार की हिस्सेदारी कितनी है? तो जवाब देना आसान नहीं होगा।

बिहार की राजनीति और शिक्षा व्यवस्था दोनों पर एक साथ रोशनी डालती है। एक तरफ जहां यह दिखाता है कि नेता भी पढ़ना चाहते हैं, दूसरी तरफ यह सवाल भी खड़ा करता है कि क्या सत्ता और अकादमिक पदों का मिश्रण वाकई शिक्षा के हित में है? छात्रों को असली शिक्षक चाहिए या फिर मंत्री-प्रोफेसर का कॉम्बिनेशन? समय बताएगा कि यह प्रयोग सफल होगा या सिर्फ एक चर्चा का विषय बनकर रह जाएगा।

अभी तो छात्र एएन कॉलेज में चर्चा कर रहे हैं  मंत्री जी क्लास ले रहे हैं, तो क्या अब पॉलिटिकल साइंस का सिलेबस भी सरकार के हिसाब से बदलेगा? या फिर असली राजनीति क्लासरूम में सिखाई जाएगी।