सत्ता के शिखर पर बैठे Nitish Kumar अपने पुत्र के साथ एक साधारण पिता की भूमिका में नजर आते
कृष्णा कुमार (उप संपादक)
बिहार की राजनीति में एक दिलचस्प और विचारणीय दृश्य सामने आता है,जहां सत्ता के शिखर पर बैठे Nitish Kumar अपने पुत्र के साथ एक साधारण पिता की भूमिका में नजर आते हैं। यह दृश्य जितना सहज दिखता है, उतना ही गहरे सवाल भी खड़े करता है।
क्या यह एक पिता का अपने पुत्र को ज्ञान देने का प्रयास है, या फिर एक अनुभवी राजनीतिज्ञ अपने उत्तराधिकारी को जीवन की कोई अनकही सीख दे रहा है।
या फिर, जैसा कि तस्वीर संकेत करती है।क्या यहां भूमिका उलट चुकी है।
Nishant Kumar, जो 52 वर्ष की आयु में भी सार्वजनिक जीवन से दूरी बनाए हुए हैं, आधुनिक राजनीति के उस मॉडल के विपरीत खड़े दिखते हैं, जहां विरासत अक्सर सक्रियता में बदल जाती है। पढ़ाई के बाद उन्होंने जिस तरह से खुद को राजनीति से अलग रखा, वह अपने आप में एक संदेश है।शायद सत्ता से ज्यादा सादगी का चुनाव।
भारतीय राजनीति में Lalu Prasad Yadav का उदाहरण अक्सर दिया जाता है, जहां परिवार सीधे सत्ता और संगठन का हिस्सा बनता है। वहां राजनीति एक विरासत बनकर पीढ़ी दर पीढ़ी चलती है, जबकि यहां एक दूरी, एक संकोच, और शायद एक अलग दृष्टिकोण दिखाई देता है।
यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या Nitish Kumar ने अपने राजनीतिक जीवन में इतना समय दिया कि पारिवारिक जिम्मेदारियां पीछे छूट गईं।
या फिर यह उनकी सजग रणनीति थी कि परिवार को सत्ता के केंद्र से दूर रखा जाए।
तस्वीर में कलम पकड़े हाथ सिर्फ लिख नहीं रहे, बल्कि एक संदेश भी दे रहे है।
सत्ता का उत्तराधिकारी बनाना आसान है, लेकिन जिम्मेदारी का उत्तराधिकारी बनाना सबसे कठिन।
आज के दौर में, जहां राजनीति अक्सर वंशवाद के इर्द-गिर्द घूमती है, यह दृश्य एक अलग कहानी कहता है।
यह कहानी है दूरी की, संयम की, और शायद उस अधूरे संवाद की जो एक पिता और पुत्र के बीच कभी पूरा नहीं हो पाया।

