संस्कृति

बहुत रही तू अँधियारे मे , चाँद सूरज की तू अधिकारी : डा० गीता गंगोत्री (एक अच्छी कविता)

बिहार हलचल न्यूज ,जन जन की आवाज
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1 दिवारों से बाहर आ नारी,
बैठ शिखर अब तेरी बारी ,
बहुत रही तू अँधियारे मे ,
चाँद सूरज की तू अधिकारी।

2 छोड़ अब तू चुल्हे चौके ,
छिन ले अवसर लगा तू छक्के
जिल्लत की तिखी तलवारें,
नहीं कहीं किसी द्वार तुम्हारे,
मरूभूमि की धुप ढल रही,
खुशियों की बारात सज रही
मिलेगी प्रीत की छाँव घनेरी,
नहीं होगी कोई गीत अधुरी
ठोकर मे रख कँकड़ काँटे,
आसमान छु ले सुकुमारी ।

3 खोल खुद से बँदिश के धागे,
तोड़ दे बेड़ियों की कसनी ,
चुड़ी कंगन कमरधनी और,
कान के झुमके नाक की नथनी
फेंक नोच हो मुक्त तू सजनी,
बढ़ती जा ज्यूँ लहू बहे धमनी,
डर का नाम ना हो कही बहिनी
हिम शिखर पे चढ़ जा जननी
रख के पैर स्वप्ननील गिरी पे ,
मंगल पर आसीन हो हँसिनी
पतझड़ को वसंत तू कर ले,
तुफानों पे चला तू आरी ,
हर आंधी पर रहना भारी।
बैठ शिखर अब तेरी बारी।

बूँदों की मोहताज नही तू,
मधुमालती नाम है तेरा ,
तू सरिता तू प्यास बुझाती,
गंगा जमुना की धार हो प्यारी,
अमरलता हे अपराजिता ,
दामिनी कब किसी से हारी
आँखों मे भर शीतल काजल ,
नहीं मेघ की धार दुलारी।

उलझ ना किसी मोह धागे से,
रख पग दोनो जतन से भारी।
सप्त स्वरा हे कोकिल कंठी ,
छेड़ रागिनी हुई जीत है थारी।
नए खाब फिर देख क्षितिज के,
कर फिर उड़ने की तैयारी ,
पंखो की तुरपाई कर तू ,
बन जा उड़नपरी हे नारी ।
चाँद सूरज की तू अधिकारी।