गुलाब यादव झंझारपुर की राजनीति का वो चेहरा जिसने बदले सियासी समीकरण
संपादकीय
मधुबनी/झंझारपुर की राजनीति को अगर करीब से समझना हो तो गुलाब यादव का नाम अनदेखा नहीं किया जा सकता। ये वो नाम है जिसने सत्ता के गलियारों में नहीं, बल्कि जमीन से उठकर अपनी पहचान बनाई।
2015 का वो मोड़ जिसने इतिहास बदल दिया
2015 का बिहार विधानसभा चुनाव। झंझारपुर में सामने थे भाजपा के कद्दावर नेता और मौजूदा मंत्री नीतीश मिश्रा। बड़े-बड़े पंडित मान रहे थे कि मिश्रा की जीत तय है, लेकिन गुलाब यादव ने सभी समीकरण ध्वस्त कर दिए। मात्र 834 वोटों से, जी हां सिर्फ 834 वोटों से उन्होंने नीतीश मिश्रा को हरा दिया। ये सिर्फ एक जीत नहीं थी, ये झंझारपुर की जनता का ऐलान था कि यहां वंशवाद और रसूख नहीं, संघर्ष चलता है।
2019 – हार में भी बड़ी लकीर
कहते हैं राजनीति में हार-जीत चलती रहती है। 2019 में RJD ने उन पर भरोसा जताते हुए झंझारपुर लोकसभा से उतारा। सामने थे जदयू के रामप्रीत मंडल, जो 3,22,951 वोटों के बड़े अंतर से जीते। आंकड़ों में ये हार बड़ी दिखती है, लेकिन इस हार ने गुलाब यादव को झंझारपुर से लेकर दिल्ली तक एक बड़े चेहरे के तौर पर स्थापित कर दिया।
परिवार नहीं एक राजनीतिक विरासत
गुलाब यादव की सबसे बड़ी ताकत है उनका परिवार का जनाधार से जुड़ना। उनकी पत्नी अंबिका गुलाब यादव बिहार विधान परिषद की सदस्य बनीं और बेटी बिंदु गुलाब यादव मधुबनी जिला परिषद की अध्यक्ष। ये परिवारवाद नहीं, बल्कि एक परिवार का जनसेवा के प्रति समर्पण है।
और हां बहुत कम लोग जानते हैं कि गुलाब यादव अपने शुरुआती दिनों में लखनौर प्रखंड के प्रमुख भी रहे हैं। यानी पंचायत से लेकर पार्लियामेंट तक का सफर उन्होंने देखा है। प्रमुख से विधायक और फिर लोकसभा उम्मीदवार तक का ये सफर आसान नहीं था।
अब सवाल जनता से है
झंझारपुर की राजनीति में गुलाब यादव की भूमिका सिर्फ एक विधायक या एक उम्मीदवार की नहीं रही है। सवाल ये है कि जनता के बीच उनकी स्वीकार्यता कितनी है। उन्होंने क्षेत्र के विकास के लिए क्या किया? उनके संघर्षों को जनता कैसे देखती है।
झंझारपुर की जनता ही तय करेगी कि गुलाब यादव एक दौर थे या एक विचारधारा हैं जो आज भी जिंदा है।

