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(विशेष रिपोर्ट)  बिहार में शराबबंदी कानून का दोहरा चेहरा

बिहार हलचल न्यूज ,जन जन की आवाज
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राम दुलार यादव, प्रधान संपादक 

बिहार में शराबबंदी को लागू हुए 10 साल होने वाले हैं, लेकिन आज भी यह कानून सबसे बड़ा सवाल बना हुआ है। कागजों पर पूर्ण शराबबंदी है, थानों में रोजाना सैकड़ों केस दर्ज हो रहे हैं, लेकिन हकीकत यह है कि शराब माफियाओं का नेटवर्क पहले से ज्यादा मजबूत हो गया है।

बड़े-बड़े मगरमच्छ खुलेआम घूम रहे हैं
ग्राउंड पर सच्चाई यह है कि शराब का पूरा खेल बड़े पैमाने पर चल रहा है। ट्रक के ट्रक, कंटेनर के कंटेनर शराब बिहार में आ रही है। पुलिस की बड़ी-बड़ी जब्ती की खबरें तो आती हैं, लेकिन उन जब्ती के पीछे के असली मालिक, असली फाइनेंसर कभी सामने नहीं आते। वो बड़े मगरमच्छ आज भी खुलेआम घूम रहे हैं, सत्ता और व्यवस्था के गलियारों में उनकी पहुँच है।

तो फिर कानून का शिकंजा किस पर
कानून का शिकंजा सिर्फ उन गरीब, लाचार, छोटी मछलियों पर कसा जा रहा है। कभी एक गरीब मजदूर को एक बोतल के साथ जेल भेज दिया जाता है, तो कभी किसी घर की महिला को चुलाई के आरोप में घसीट लिया जाता है। आंकड़े चीख-चीख कर कहते हैं कि जेलों में 70% कैदी सिर्फ शराब के छोटे मामलों में बंद हैं। क्या यही न्याय है।

एक तरफ बड़े तस्कर करोड़ों का साम्राज्य खड़ा कर रहे हैं, दूसरी तरफ गरीब का घर उजड़ रहा है। एक ही कानून के दो अलग-अलग पैमाने क्यों।

व्यवस्था की नाकामियों को कब तक छिपाया जाएगा
शराबबंदी के नाम पर चल रहे इस खेल को सब देख रहे हैं। हर गली-मोहल्ले में लोग जानते हैं कि शराब कहाँ मिलती है, कैसे मिलती है। फिर भी व्यवस्था अनजान बनी हुई है। थानों में वसूली, होम डिलीवरी, और जहरीली शराब से होने वाली मौतें क्या यही शराबबंदी की सफलता है।

सवाल सीधा है  अगर कानून सबके लिए बराबर है, तो कार्रवाई भी सबके लिए बराबर होनी चाहिए। सिर्फ गरीबों को पीसकर शराबबंदी को सफल बताना, अपनी नाकामियों पर पर्दा डालने जैसा है।

जनता सब देख रही है, समझ रही है। अब वक्त आ गया है कि सरकार आत्ममंथन करे कि यह शराबबंदी है या शराबबंदी के नाम पर गरीबों को बंद करने की साजिश।