Tejashwi Yadav की अगुवाई वाली Rashtriya Janata Dal अब राज्यसभा पहुंचने के लिए ऐसे रास्ते तलाश रही
राजकुमार यादव की रिपोर्ट
बिहार की राजनीति एक बार फिर उस मोड़ पर खड़ी है। राज्यसभा की एक सीट के लिए शुरू हुआ जोड़-तोड़ यह साबित करता है कि लोकतंत्र के मंदिर में भी सौदेबाज़ी की फुसफुसाहट कितनी तेज़ हो चुकी है।
Tejashwi Yadav की अगुवाई वाली Rashtriya Janata Dal अब राज्यसभा पहुंचने के लिए ऐसे रास्ते तलाश रही है, जहाँ विचारधारा से ज़्यादा गणित काम करता है। सबसे ज्यादा चर्चा में Akhtarul Iman का नाम है, जो All India Majlis-e-Ittehadul Muslimeen के विधायक हैं। कभी तेजस्वी की दरबारी राजनीति से दूरी बनाने की बात करने वाले अख्तरूल ईमाम आज राजनीतिक समीकरणों के केंद्र में आ गए हैं।
बिहार में एक पुरानी कहावत है।वन का गीदड़ जइहिए किधर?” यानी जब बिहार में रहना है तो लालू प्रसाद यादव से बगावत …हेकरी निकाल दी जाएगी। बिहार की राजनीति में भी यही दृश्य दिख रहा है। सिद्धांतों के बड़े-बड़े भाषण देने वाले नेता अब लल्लू के गलियारों में अल्लू खोदते नजर आएंगे!
वहीं विधायक I. P. Gupta की स्थिति भी किसी से छिपी नहीं है। राजनीति के इस खेल में वह मानो खुले मैदान में खड़े खिलाड़ी की तरह हैं—जहाँ न मजबूत साथी हैं और न स्पष्ट दिशा। ऐसे में कभी एनडीए की तरफ नज़र, तो कभी दूसरी तरफ उम्मीद—यह सब उस राजनीति का हिस्सा बन गया है, जहाँ विचारधारा से अधिक अवसरवाद मायने रखता है।
कांग्रेस की स्थिति तो और भी दिलचस्प है। बिहार की राजनीति में कभी निर्णायक भूमिका निभाने वाली पार्टी आज उस कहावत को चरितार्थ करती दिखती है—“बाप बड़ा ना भैया, सबसे बड़ा रुपैया।” सत्ता के समीकरण में हिस्सेदारी के लिए वह भी उसी धारा में बहती दिखती है, जहाँ सिद्धांतों की कीमत कम और सत्ता की कीमत ज्यादा है।
दरअसल यह पूरा घटनाक्रम सिर्फ एक राज्यसभा सीट का नहीं है। यह उस राजनीतिक संस्कृति का आईना है, जहाँ जनता के मुद्दे पीछे छूट जाते हैं और नेताओं की प्राथमिकता सत्ता के गलियारों तक पहुँचने की हो जाती है।
लोकतंत्र की असली ताकत जनता है। लेकिन जब जनता के नाम पर राजनीति करने वाले ही सत्ता के लिए विचारधारा बदलने लगें, तब सवाल उठना स्वाभाविक है।क्या लोकतंत्र का यह रूप वही है।

