अवर निबंधक सहित 12 पर प्राथमिकी दर्ज, पूर्व से न्यायालय में लंबित है जमीनी विवाद
सुरेश कुमार गुप्ता की रिपोर्ट
मधुबनी जयनगर बाजार वार्ड संख्या 11 निवासी दीनानाथ गुप्ता द्वारा स्थानीय थाने में एक गंभीर मामला दर्ज कराए जाने के बाद क्षेत्र में चर्चा का माहौल बना हुआ है। दीनानाथ गुप्ता ने जयनगर के अवर निबंधक सहित कुल 12 लोगों को नामजद आरोपी बनाते हुए प्राथमिकी दर्ज कराई है। यह मामला जमीन से जुड़े पुराने विवाद से संबंधित बताया जा रहा है, जो पहले से ही न्यायालय में विचाराधीन है। खास बात यह है कि संबंधित भूमि पर न्यायालय द्वारा पूर्व में “इंजेक्शन शूट” अर्थात इंजंक्शन आदेश (स्थगन आदेश) जारी किया जा चुका है।
क्या है पूरा मामला – शिकायतकर्ता दीनानाथ गुप्ता के अनुसार, उनकी पुश्तैनी अथवा स्वामित्व वाली भूमि को लेकर पहले से ही न्यायालय में वाद दायर है। इस मामले में न्यायालय ने यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया था। आम तौर पर ऐसे आदेश का अर्थ होता है कि विवादित संपत्ति की स्थिति में किसी प्रकार का परिवर्तन नहीं किया जा सकता — न तो बिक्री, न रजिस्ट्री और न ही स्वामित्व में बदलाव।दीनानाथ गुप्ता का आरोप है कि न्यायालय के स्पष्ट आदेश के बावजूद संबंधित भूमि की रजिस्ट्री कराने का प्रयास किया गया या रजिस्ट्री कर दी गई। उन्होंने आरोप लगाया है कि इस प्रक्रिया में अवर निबंधक कार्यालय की भूमिका संदिग्ध रही और बिना न्यायालय के आदेश की जानकारी या उसे नजरअंदाज करते हुए दस्तावेज पंजीकृत किए गए।
नामजद आरोपी कौन : – प्राथमिकी में अवर निबंधक जयनगर के अतिरिक्त कुल 12 लोगों को आरोपी बनाया गया है। इनमें कथित खरीदार, बिचौलिये तथा अन्य सहयोगी शामिल बताए जा रहे हैं। शिकायतकर्ता का कहना है कि यह सब एक सुनियोजित साजिश के तहत किया गया, ताकि न्यायालय के आदेश को दरकिनार कर संपत्ति का हस्तांतरण किया जा सके।दीनानाथ गुप्ता का आरोप है कि आरोपियों ने मिलकर दस्तावेज तैयार किए, प्रस्तुत किए और रजिस्ट्री की प्रक्रिया पूरी कराई। उनका कहना है कि यह कृत्य न केवल उनके अधिकारों का हनन है, बल्कि न्यायालय के आदेश की अवमानना भी है।
न्यायालय का इंजंक्शन आदेश – इस मामले की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी न्यायालय द्वारा दिया गया स्थगन आदेश है। जब किसी भूमि विवाद में अदालत “इंजंक्शन” जारी करती है, तो इसका उद्देश्य होता है कि जब तक अंतिम निर्णय न हो, तब तक किसी भी पक्ष द्वारा संपत्ति की स्थिति में बदलाव न किया जाए।यदि इस आदेश के बावजूद रजिस्ट्री या हस्तांतरण किया जाता है, तो यह गंभीर कानूनी प्रश्न खड़ा करता है। ऐसे मामलों में अदालत की अवमानना (Contempt of Court) का मामला भी बन सकता है, साथ ही संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही भी तय की जा सकती है।
पुलिस की कार्रवाई – स्थानीय थाने में प्राथमिकी दर्ज होने के बाद पुलिस ने प्रारंभिक जांच शुरू कर दी है। संबंधित दस्तावेजों की जांच, रजिस्ट्री कार्यालय के रिकॉर्ड का सत्यापन और न्यायालय के आदेश की प्रति की समीक्षा की जा रही है। पुलिस सूत्रों के अनुसार, यदि प्रथम दृष्टया आरोप सही पाए जाते हैं तो आगे की कानूनी कार्रवाई की जाएगी।पुलिस का कहना है कि जांच निष्पक्ष और तथ्यों के आधार पर होगी। किसी भी व्यक्ति को केवल आरोप के आधार पर दोषी नहीं ठहराया जाएगा, बल्कि साक्ष्यों और दस्तावेजों के आधार पर निर्णय लिया जाएगा।
कानूनी पहलू – विधि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि किसी भूमि पर न्यायालय का स्थगन आदेश लागू है, तो संबंधित कार्यालय को रजिस्ट्री से पूर्व उस आदेश की जांच करनी चाहिए। यदि जानबूझकर या लापरवाहीवश आदेश की अनदेखी की गई है, तो यह गंभीर प्रशासनिक त्रुटि मानी जा सकती है।ऐसे मामलों में भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराएं — जैसे धोखाधड़ी, जालसाजी, आपराधिक साजिश — लागू हो सकती हैं। साथ ही न्यायालय की अवमानना का मामला अलग से चलाया जा सकता है।सामाजिक और प्रशासनिक प्रभाव इस घटना ने8 जयनगर क्षेत्र में भूमि पंजीकरण प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि न्यायालय के आदेश के बावजूद रजिस्ट्री हो सकती है, तो आम नागरिकों के अधिकार सुरक्षित कैसे रहेंगे? यह मामला प्रशासनिक जवाबदेही और निगरानी प्रणाली को मजबूत करने की आवश्यकता की ओर संकेत करता है।भूमि विवाद भारत में अक्सर लंबे समय तक चलते हैं और कई बार इसमें जटिल कानूनी प्रक्रियाएं शामिल होती हैं। ऐसे में न्यायालय के आदेशों का सख्ती से पालन करना अत्यंत आवश्यक है। यदि अधिकारी या अन्य व्यक्ति आदेश की अनदेखी करते हैं, तो यह न्याय व्यवस्था में लोगों के विश्वास को कमजोर करता है।
शिकायतकर्ता की मांग – दीनानाथ गुप्ता ने प्रशासन से मांग की है कि पूरे मामले की उच्च स्तरीय जांच कराई जाए और दोषियों के विरुद्ध सख्त कार्रवाई की जाए। उन्होंने यह भी कहा है कि जब मामला न्यायालय में लंबित है और स्पष्ट आदेश मौजूद है, तो किसी भी प्रकार का हस्तांतरण अवैध माना जाना चाहिए।उन्होंने विश्वास जताया है कि उन्हें न्यायालय और कानून पर पूरा भरोसा है और सच्चाई सामने आएगी।
जयनगर का यह मामला केवल एक व्यक्ति और कुछ आरोपियों के बीच का विवाद नहीं है, बल्कि यह न्यायालय के आदेशों की गरिमा और प्रशासनिक प्रक्रिया की पारदर्शिता से जुड़ा प्रश्न है। यदि जांच में आरोप प्रमाणित होते हैं, तो यह एक मिसाल बन सकता है कि न्यायालय के आदेश की अवहेलना किसी भी परिस्थिति में स्वीकार्य नहीं है।अब सबकी निगाहें पुलिस जांच और न्यायालय की अगली कार्यवाही पर टिकी हैं। आने वाले समय में यह स्पष्ट होगा कि आरोप कितने सही हैं और किस स्तर पर जिम्मेदारी तय की जाती है। तब तक यह मामला जयनगर क्षेत्र में चर्चा और कानूनी बहस का विषय बना रहेगा।

