नेपाल ने भीषण बाढ़ और तबाही के इस कठिन समय में भारत, चीन समेत कई देशों की रेस्क्यू टीमों की मदद लेने से इनकार
सुनीता कुमारी -संपादक
देश-विदेश/नेपाल ने भीषण बाढ़ और तबाही के इस कठिन समय में भारत, चीन समेत कई देशों की रेस्क्यू टीमों की मदद लेने से इनकार कर दिया है। नेपाल सरकार का तर्क है कि उसकी सेना और सुरक्षा एजेंसियां खुद राहत एवं बचाव अभियान चलाने में सक्षम हैं।
किसी भी संप्रभु राष्ट्र का अपनी क्षमता पर भरोसा करना गर्व की बात है। सेना और स्थानीय बचाव दलों का मुस्तैदी से लोगों को सुरक्षित निकालना और राहत पहुंचाना सराहनीय है। यह नेपाल के आत्मविश्वास को दर्शाता है।
लेकिन सवाल मानवीय संवेदना का भी है। जब बाढ़ में सैकड़ों जिंदगियां दांव पर हों, गांव के गांव डूबे हों और हर मिनट कीमती हो, तब क्या सिर्फ अपनी क्षमता पर निर्भर रहना सही रणनीति है?
आपदा का कोई पासपोर्ट नहीं होता। 2015 के भूकंप में भारत का ‘ऑपरेशन मैत्री’ हो या दुनिया के अन्य देशों की मदद, नेपाल ने हमेशा मानवीय सहयोग को स्वीकारा है। अंतरराष्ट्रीय रेस्क्यू टीमें सिर्फ मदद नहीं, बल्कि विशेषज्ञता, आधुनिक उपकरण और अनुभव भी लाती हैं, जो नुकसान को कम कर सकती हैं।
मदद लेना कमजोरी नहीं, बल्कि अपने नागरिकों के प्रति जिम्मेदारी है। नेपाल हमारा पड़ोसी ही नहीं, सांस्कृतिक और आत्मीय मित्र है। ऐसे में उसकी पीड़ा हमारी भी है।
हम आशा करते हैं कि नेपाल की सेना इस चुनौती से सफलतापूर्वक निपटेगी। लेकिन साथ ही यह भी उम्मीद है कि यदि हालात और बिगड़ते हैं, तो नेपाल मानवीय हित को सर्वोपरि रखते हुए मित्र देशों के हाथ बढ़ाए गए सहयोग को स्वीकार करने में संकोच नहीं करेगा। क्योंकि आपदा के समय हर जान बचाना ही सबसे बड़ा स्वाभिमान है।

