जब न्याय का तराजू एक तरफ सत्ता की चाशनी में डूबा दिखता है और दूसरी तरफ संघर्ष की आग में जलता हुआ
कृष्णा कुमार
बिहार के इतिहास में आज का दिन काले अक्षरों में लिखा जाएगा। जब न्याय का तराजू एक तरफ सत्ता की चाशनी में डूबा दिखता है और दूसरी तरफ संघर्ष की आग में जलता हुआ।
क्या हमने इसी दिन के लिए लोकतंत्र का सपना देखा था, जहाँ एक ही जुर्म या उससे भी संगीन आरोपों के लिए दो अलग-अलग पैमाने इस्तेमाल किए जाएं।
अनंत सिंह और मुन्ना शुक्ला. एक कड़वी तुलना
आज चर्चा का केंद्र दो बड़े नाम हैं।अनंत सिंह और मुन्ना शुक्ला। लेकिन चर्चा उनके नाम की नहीं, उनके साथ हुए व्यवहार की है।
एक तरफ वो रसूख जिस पर AK-47 जैसे घातक हथियार रखने का आरोप लगा, जिस पर UAPA (आतंकवाद विरोधी कानून) जैसी धाराएं लगीं, जहाँ सबूतों के अंबार की बात कही गई। लेकिन आश्चर्य देखिए। मात्र 4 महीनों के भीतर उन्हें राहत मिल जाती है, रिहाई मिल जाती है। क्या कानून की धाराएं सत्ता के करीब जाते ही नरम पड़ जाती हैं।
दूसरी तरफ वो संघर्ष हमारे अपने, लालगंज के गौरव मुन्ना शुक्ला जी। एक ऐसा मामला जो 28 साल पुराना (1998) है। जिसमें हाई कोर्ट ने उन्हें बाइज्जत बरी कर दिया था। एक व्यक्ति जिसने अपनी जवानी के कीमती साल कोर्ट की दहलीज पर अपनी बेगुनाही साबित करने में लगा दिए। और जब वह समाज सेवा के शिखर पर हैं, तो 10 साल बाद अचानक उसी बंद फाइल को खोलकर उन्हें उम्रकैद की सजा सुना दी जाती है ।
अनंत सिंह को राहत मिली, उनके समर्थक खुश हैं और हमारे समाज के साथी होने के नाते हम उनकी खुशी का सम्मान करते हैं। हमें किसी की व्यक्तिगत रिहाई या राहत से कोई शिकवा नहीं है।

