वैचारिक आज़ादी के नाम पर अगर कोई ओछी, घटिया और चरित्रहनन की राजनीति करे तो उस पर चुप रहना भी अपराध है
अंजू की रिपोर्ट
पटना / शंभू गर्ल्स हॉस्टल प्रकरण में पीड़िता के कपड़ों पर स्पर्म मिलने के बावजूद असली अपराधी आज भी पुलिस और SIT की पकड़ से बाहर है। यह सीधा-सीधा पुलिस की नाकामी और सिस्टम की विफलता है। इस फेलियर की जवाबदेही तय करने के बजाय अगर कोई रिटायर्ड आईपीएस अधिकारी बेतुके आरोप उछालने लगे तो सवाल उठना लाज़मी है।
रिटायर्ड आईपीएस अमिताभ दास कहते हैं कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के पुत्र निशांत कुमार का डीएनए सैंपल लिया जाना चाहिए। यह न सिर्फ़ गैर-जिम्मेदाराना है, बल्कि मानसिक दिवालियापन का सार्वजनिक प्रदर्शन है। बिना किसी सबूत, बिना किसी तथ्य, सिर्फ़ सस्ती सनसनी के आधार पर किसी व्यक्ति को अपराध से जोड़ देना, यह कानून नहीं, लिंचिंग की मानसिकता है। आपको किसने अधिकार दिया कि आप किसी की छवि को यूं ही कीचड़ में घसीटें? आप आईपीएस अधिकारी रहे हैं। इसका मतलब होता है विवेक, संवैधानिक समझ और ज़िम्मेदारी। लेकिन ऐसा बेतुका आरोप तो वे आईपीएस अधिकारी भी नहीं लगाते, जिन्हें निजी तौर पर नीतीश कुमार से नाराज़गी रही है।
निशांत कुमार को हमने देखा है। एक डीएम का पैर छूते हुए। मंत्री का पैर छूते हुए। विधायक को प्रणाम करते हुए।
एक मुख्यमंत्री का बेटा होकर भी न सत्ता का अहंकार और न सिस्टम पर कब्ज़े का भ्रम। आज जब छुटभैये नेता और उनके चमचे रील बनाकर अफसरों को धमकाते घूमते हैं, तब एक सीएम के बेटे की यह शालीनता तमाचा है उस सड़ांध भरी राजनीतिक संस्कृति पर। तो फिर यह आरोप क्यों? यह चरित्रहनन क्यों? यह सस्ती साज़िश क्यों? और सबसे शर्मनाक बात यह है कि इस बेतुके आरोप के समर्थन में भी लोग मिल जाते हैं जो कहते हैं, हां, डीएनए टेस्ट होना चाहिए। शर्म कीजिए। आप न्याय नहीं, अफ़वाहों की अदालत चला रहे हैं। आप फ्रीडम ऑफ स्पीच नहीं, फ्रीडम टू सनसनी का झंडा उठा रहे हैं। अभिव्यक्ति की आज़ादी का मतलब यह नहीं कि आप बिना सबूत किसी को अपराधी घोषित कर दें।

