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भारत में प्रस्तावित टी–20 मैच न खेलने का फैसला

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न्यूज डेस्क 

पटना/बांग्लादेश द्वारा सुरक्षा कारणों का बहाना बनाकर भारत में प्रस्तावित टी–20 मैच न खेलने का फैसला अपने आप में चोर की दाढ़ी में तिनका साबित करता है। यह निर्णय बांग्लादेश की उस दोहरी नीति को उजागर करता है, जिसमें एक ओर वह भारत पर सुरक्षा का सवाल खड़ा करता है, वहीं दूसरी ओर अपने ही देश में हिंदू अल्पसंख्यकों पर हो रहे हमलों, मारपीट और हत्याओं से आंखें मूंदे बैठा है।
सच यह है कि बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यक आज असुरक्षित हैं। मंदिरों पर हमले, घरों को जलाना, महिलाओं के साथ अत्याचार और निर्दोष लोगों की हत्याएं—ये सब घटनाएं किसी एक दिन की नहीं, बल्कि लगातार चल रही हैं। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी इस विषय पर चिंता जताई जा चुकी है। ऐसे में भारत की सुरक्षा पर सवाल उठाना न केवल हास्यास्पद है, बल्कि अपनी नाकामियों से ध्यान भटकाने की साजिश भी है।
यह भी जगजाहिर है कि बांग्लादेश से भारत में अवैध घुसपैठ की समस्या वर्षों से चली आ रही है। घुसपैठियों में भारत का कोई भय दिखाई नहीं देता—सीमाएं पार कर ली जाती हैं, कानून को चुनौती दी जाती है—लेकिन जब बात क्रिकेट खेलने की आती है तो अचानक “सुरक्षा” याद आ जाती है। यह विरोधाभास साफ संकेत देता है कि मामला सुरक्षा का नहीं, बल्कि राजनीतिक दबाव और अंतरराष्ट्रीय छवि प्रबंधन का है।
भारत एक सुरक्षित, जिम्मेदार और खेलों का सम्मान करने वाला देश है। यहां विश्व स्तर के आयोजन बिना किसी बाधा के होते रहे हैं। भारतीय सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल उठाना न सिर्फ तथ्यहीन है, बल्कि खेल भावना के भी खिलाफ है। बांग्लादेश को चाहिए कि वह पहले अपने देश में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित करे, कानून-व्यवस्था को मजबूत करे और मानवाधिकारों का सम्मान करे, बजाय इसके कि वह भारत पर निराधार आरोप लगाए।
यह निर्णय बांग्लादेश की असहजता और अपराधबोध को उजागर करता है। सच से भागा नहीं जा सकता। दुनिया देख रही है और इतिहास सब दर्ज कर रहा है। खेल को राजनीति का मोहरा बनाकर बांग्लादेश न तो अपनी जिम्मेदारियों से बच सकता है और न ही सच्चाई को छिपा सकता है।