सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि बड़े हादसे उसके बाद कार्रवाई का दिखावा और छापेमारी फिर निलंबन अब जांच
सुरेंद्र कुमार सिंह
मोतिहारी में हुए जहरीली शराब कांड ने एक बार फिर बिहार में लागू शराबबंदी कानून और पुलिस व्यवस्था की पोल खोल दी है। इस घटना में कई लोगों की जान जाने के बाद भी जिस तरह से मुख्य आरोपितों ने खुद कोर्ट में जाकर आत्मसमर्पण किया, वह कानून-व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।
मामले के प्रमुख आरोपित कन्हैया यादव और सुनील साह ने पुलिस की लगातार छापेमारी के बावजूद गिरफ्तारी से बचते हुए अंततः न्यायालय में आत्मसमर्पण कर दिया। इस दौरान दिलीप कुमार (सदर डीएसपी) भी कोर्ट पहुंचे और टीम द्वारा पूछताछ की प्रक्रिया शुरू की गई। लेकिन यहां सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब आरोपी खुलेआम इलाके में सक्रिय थे, तो पुलिस उन्हें पहले पकड़ने में नाकाम क्यों रही?
बिहार में शराबबंदी लागू होने के बावजूद गली-मोहल्लों, चौराहों और ग्रामीण इलाकों में अवैध शराब की बिक्री किसी से छिपी नहीं है। स्थानीय स्तर पर यह एक “ओपन सीक्रेट” बन चुका है। इसके बावजूद पुलिस का यह दावा कि उन्हें नेटवर्क की जानकारी नहीं थी, आम जनता के गले नहीं उतरता।
इस पूरे मामले में राजनीतिक रंग भी तेजी से चढ़ रहा है। आरोप लगाए जा रहे हैं कि कन्हैया यादव का संबंध राष्ट्रीय जनता दल से जुड़ा हुआ है और वह पार्टी का बड़ा डोनर रहा है। हालांकि यह भी उतना ही सच है कि किसी एक व्यक्ति के अपराध के आधार पर पूरे समाज या जाति को कटघरे में खड़ा करना न्यायसंगत नहीं है। लेकिन जब अपराध और राजनीति का गठजोड़ सामने आता है, तो सवाल उठना लाजिमी है।
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि हर बड़े हादसे के बाद कार्रवाई का दिखावा होता और छापेमारी फिर निलंबन अब जांच—लेकिन जमीनी स्तर पर स्थिति जस की तस बनी रहती है। जहरीली शराब से मौतें रुकने का नाम नहीं ले रही हैं, और प्रशासन हर बार “कार्रवाई जारी है” का रटा-रटाया जवाब देता नजर आता है।
मोतिहारी कांड ने यह साफ कर दिया है कि केवल कानून बना देने से समस्या खत्म नहीं होती। जब तक स्थानीय प्रशासन, पुलिस और राजनीतिक तंत्र की जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक ऐसे हादसे दोहराए जाते रहेंगे।
अब सवाल यह नहीं है कि आरोपी कौन है, बल्कि यह है कि
क्या बिहार में कानून का राज वास्तव में जमीन पर लागू हो रहा है, या फिर सब कुछ कागजों तक सीमित रह गया है।

