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डॉ लक्ष्मण यादव की किताब जाति जनगणना: जात से जमात की किताब पर परिचर्चा

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पटना/जगजीवन राम संसदीय शोध संस्थान, पटना में लेखक डॉ लक्ष्मण यादव की किताब जाति जनगणना : जात से जमात की ओर किताब पर परिचर्चा आयोजित की गई। इस कार्यक्रम का आयोजन प्रेरणा कोचिंग संस्थान, श्री कृष्ण चेतना मंच बिहार, एवं सामाजिक न्याय आंदोलन,बिहार ने किया।

परिचर्चा में वरिष्ठ पत्रकार शीतल पी सिंह, साहित्यकार व जन बुद्धिजीवि सुभाष चंद्र कुशवाहा, सामाजिक चिंतक व लेखकरिंकू यादव साहित्यकार डॉ उषा, लेखक पत्रकार इर्शादुल हक़ , प्राध्यापक व युवा लेखक डॉ मनोज गुप्ता उपस्थित रहें।

कार्यक्रम का संचालन प्राध्यापक डॉ.अनुज कुमार तरुण ने किया एवं स्वागत वक्तव्य पटना विश्वविद्यालय के शोधार्थी
अंबुज पटेल ने दिया।

लेखक डॉ .लक्ष्मण यादव ने किताब से परिचय करवाते हुए शुरुआती वक्तव्य दिया। उन्होंने कहा कि यह किताब इस दौर के सबसे जरूरी सवालों पर लिखी गई है। हमने ये महसूस किया कि जाति जनगणना को जातिवादी एवं समाज विरोधी बिना किसी तथ्य के कहा जा रहा है। यह किताब जाति जनगणना की जरूरत क्यों है? इस सवाल का जवाब तथ्यों के साथ तार्किक ढंग से देने की कोशिश की है।

IMG 20260330 WA0002 डॉ लक्ष्मण यादव की किताब जाति जनगणना: जात से जमात की किताब पर परिचर्चासामाजिक चिंतक एवं लेखक रिंकू यादव ने कहा कि बिहार में जो सामाजिक न्याय की लड़ाई चल रही है उसको यह किताब और मजबूती देगी और धार देगी। 2014 के बाद जो बहुजन आंदोलन उभर के आया है उस बीच से यह किताब आई है, यह आंदोलन की किताब है उसको आगे बढ़ाने वाली किताब है। सामाजिक न्याय आंदोलन के सामने जो चुनौती है उस चुनौती से यह किताब लड़ने ME मदद करेगी।

इर्शादुल हक़ ने कहा कि यह किताब बेहद शानदार है। सांप्रदायिकता आज देश में हावी है।सामाजिक न्याय तभी संभव है जब धर्मनिरपेक्षता जिंदा रहेगा। सामाजिक न्याय की ताकतों को आगे बढ़ कर मुकाबला करना है। यह किताब सामाजिक न्याय के लड़ाई को मजबूती प्रदान करेगा।

डॉ उषा ने कहा कि यह किताब बहुत रोचक शैली में लिखी गई है। जाति जैसी जटिल समस्या को समझने में बहुत लाभदायक होगी यह किताब। इसकी भाषा भी आसान है। जाति जैसा शब्द हमारे समाज के कलेजे पर रखा हुआ भारी चट्टान की तरह है जिससे समाज का दम घूंट रहा है। यह किताब जाति जनगणना के उपर आने वाली तमाम आगामी किताबों के लिए प्रस्तावना का काम करेंगी।मुझे इस किताब से यह निचोड़ मिलता है कि पितृसत्ता की जड़े जाति व्यवस्था में गड़ी हुई हैं।

सुभाष चंद्र कुशवाहा ने कहा कि जाति जनगणना सिर्फ वंचित तबकों का प्रश्न नहीं है। यह देश के मुक्ति का प्रश्न है। जब पूरा समाज विकसित होगा तो देश भी विकसित होगा। आज भी समाज में जातिवाद व्याप्त है। आज भी घोड़ी पर चढ़ने नहीं दिया जाता है, मूंछ रखने पर मार दिया जा रहा है।विकसित होने के लिए सामाजिक न्याय चाहिए। यह किताब जाति से जमात की बात करती है और इसी दिशा में बहुजनों को बढ़ना चाहिए।

वरिष्ठ पत्रकार शीतल पी सिंह ने संबोधित करते हुए कहा कि यह किताब जाति संबंधित आंकड़े एवं अन्य जानकारियों से हमे ज्ञात कराती है। प्रभुत्वशाली वर्गों ने हम तक हमसे जुड़ी सूचनाओं से वंचित रखा है। मीडिया में भी बड़े स्तर पर जातिवाद है। आज भी वंचित तबके के लोग मीडिया सेक्टर में बहुत कम संख्या में हैं। तकनीक के विकाश ने मनुष्यों की आजादी को कम किया है। पूंजीवादी ताकतों की शक्तियों में वृद्धि किया है।