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ओस की बूंदों और भैरव के सुरों से सजी पटना की सुबह: ईको पार्क में ‘संगीत बिहान’ की गूंज

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न्यूज डेक्स 

​पटना/ राजधानी की भागदौड़ भरी जिंदगी के बीच आज की सुबह कुछ अलग थी। ईको पार्क की हरियाली पर बिखरी ओस की चांदी जैसी बूंदें और ताजी हवा के झोंकों के बीच जब बनारस घराने के सुर घुले, तो टहलने निकले शहरवासी ठिठक कर रह गए। कला एवं संस्कृति विभाग तथा बिहार संगीत नाटक अकादमी द्वारा आयोजित ‘संगीत बिहान’ ने आज प्रकृति और संगीत का एक ऐसा कोलाज पेश किया, जिसने परंपरा को सीधे मिट्टी और आम जन से जोड़ दिया।

​खुले आसमान के नीचे सुरमई शुरुआत
​किसी बंद ऑडिटोरियम के ताम-झाम से दूर, ऊंचे पेड़ों की छांव और पक्षियों की चहचहाहट के बीच कार्यक्रम का आगाज़ हुआ। बिहार संगीत नाटक अकादमी के सचिव श्री महमूद आलम ने मुख्य कलाकार श्री विवेक कुमार शिरोमणी का अभिनंदन किया। पारंपरिक मंच के बजाय, पार्क के प्राकृतिक परिवेश ने इस आयोजन को एक ‘ओपन-एयर’ कॉन्सर्ट का रूप दे दिया, जहाँ कोई दीवार संगीत को थामने वाली नहीं थी।

​अहीर भैरव से होली की उमंग तक
​जैसे ही विवेक कुमार शिरोमणी ने राग अहीर भैरव की बंदिश “अलबेला साजन आयो रे” छेड़ी, योग कर रहे लोगों और जॉगिंग ट्रैक पर दौड़ते युवाओं के कदम अपने आप थम गए।
​आध्यात्मिक स्पर्श: राग भैरवी में प्रस्तुत भजन “मैं ना जियूँ बिन राम” ने सुबह की शांति को एक अलौकिक गहराई दी।
​फागुनी बयार: जैसे-जैसे धूप खिली, गायक ने फागुन की दस्तक देते हुए दादरा और “अंखियन डालत अबीर” जैसे होली गीतों से हवा में एक अनूठी ऊर्जा भर दी।
​”यह अद्भुत अनुभव है। रोज़ यहाँ टहलने आता हूँ, लेकिन आज ओस भरी घास पर बैठकर शास्त्रीय संगीत सुनना दिल को सुकून दे गया।” – पार्क में आए एक कला प्रेमी

प्रकृति और वाद्य यंत्रों का तालमेल
पार्क के खुले वातावरण में अनुराग कुमार मिश्र के तबले की थाप और प्रेम चंद लाल के हारमोनियम की गूँज एक अलग ही प्रभाव पैदा कर रही थी। सुदीपा घोष के कुशल संचालन ने दर्शकों को गायकी की बारीकियों से जोड़े रखा।

​यह आयोजन केवल एक संगीत कार्यक्रम नहीं, बल्कि पटना की सांस्कृतिक चेतना को ड्राइंग रूम से निकालकर प्रकृति की गोद में लाने का एक सफल प्रयास रहा। जॉगिंग सूट में संगीत सुनते लोग और पेड़ों के बीच गूंजते बनारस घराने के सुरों ने यह साबित कर दिया कि कला जब जनमानस से मिलती है, तो वह और भी जीवंत हो उठती है।