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नेशनल स्कूल .जहाँ आज़ादी पढ़ाई जाती थी, आज उपेक्षा में दम तोड़ रहा इतिहास

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Bihar Halchal news की विशेष रिपोर्ट 
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दरभंगा टावर के पास खड़ा एक जर्जर-सा भवन आज आम लोगों को बस एक पुरानी इमारत देखने को मिलता है। जहां यही इमारत कभी वह जगह थी, जहाँ भारत की आज़ादी की पटकथा लिखी जा रही थी। वहीं नाम है नेशनल स्कूल दरभंगा।

वर्ष 1920 में स्थापित यह विद्यालय न सिर्फ शिक्षा का केंद्र था, बल्कि स्वतंत्रता आंदोलन की प्रयोगशाला भी था

गांधी के आह्वान पर हुआ था जन्म

महात्मा गांधी के आदेशानुसार स्वतंत्रता सेनानी कमलेश्वरी  की देखरेख में इस राष्ट्रीय विद्यालय की स्थापना की गई। उद्देश्य साफ था ।ब्रिटिश शिक्षा प्रणाली के समानांतर एक ऐसा संस्थान, जो युवाओं में राष्ट्रभक्ति, स्वराज और आत्मसम्मान का भाव पैदा करे।यह वही दौर था जब देश असहयोग आंदोलन की लपटों में जल रहा था और शिक्षा को भी आंदोलन का हथियार बनाया जा रहा था।

जहाँ पढ़ाई और आंदोलन साथ-साथ चले

नेशनल स्कूल से पढ़कर निकले छात्र सिर्फ डिग्रीधारी नहीं बने, बल्कि राष्ट्रनिर्माता बने।

नेपाल के भूतपूर्व प्रधानमंत्री स्व. मातृका प्रसाद कोइराला इसी स्कूल के छात्र रहे। यह तथ्य अपने आप में इस स्कूल की ऐतिहासिक और अंतरराष्ट्रीय महत्ता को रेखांकित करता है।

1930 के बाद आंदोलन का केंद्र

1930 तक आते-आते नेशनल स्कूल दरभंगा में स्वतंत्रता आंदोलन का मुख्य केंद्र बन गया।दरभंगा के चर्चित असहयोगी नेता ब्रज किशोर प्रसाद और बाबू धरनीधर ने इस विद्यालय को सत्याग्रह से जुड़ी गतिविधियों का ठिकाना बना दिया।

यहीं बैठकर सभाएँ होती थीं, योजनाएँ बनती थीं और अंग्रेज़ी हुकूमत के खिलाफ रणनीति तय होती थी

युवक संघ और नई पीढ़ी की तैयारी

वर्ष 1929 में पं. रामनंदन मिश्र एवं उनकी पत्नी की प्रेरणा से कमलेश्वरी बाबू ने दरभंगा में युवक संघ की स्थापना की।

इस संगठन का मुख्यालय भी नेशनल स्कूल ही बना।
युवाओं को संगठित करना, उन्हें आंदोलन से जोड़ना और नेतृत्व के लिए तैयार करना—इसमें इस विद्यालय की भूमिका अहम रही।

जहाँ गांधी से कर्पूरी तक पहुँचे

स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान यह विद्यालय देश के कई शीर्ष नेताओं का साक्षी बना। महात्मा गांधी, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, जयप्रकाश नारायण, गुलजारी लाल नंदा, सत्यनारायण सिन्हा और कर्पूरी ठाकुर जैसे नेता आंदोलन के दिनों में यहाँ आए।

यह स्पष्ट करना ज़रूरी है कि कर्पूरी ठाकुर ने यहाँ औपचारिक शिक्षा नहीं ली, लेकिन आंदोलन से जुड़े कार्यक्रमों और बैठकों में उनकी उपस्थिति ऐतिहासिक रूप से दर्ज मानी जाती है।

आज सवालों के घेरे में धरोहर

आज वही नेशनल स्कूल जर्जर अवस्था में है। दीवारें दरक चुकी हैं, छतें गिरने को हैं और किसी भी दिन बड़ा हादसा हो सकता है।

सबसे बड़ा सवाल यही है

क्या बिहार अपनी आज़ादी की विरासत को यूँ ही मिटने देगा?जिस इमारत ने देश को आज़ादी का सपना दिखाया, वह आज सरकारी उदासीनता की शिकार है।
संरक्षण या विस्मृति?

स्थानीय इतिहासकारों और सामाजिक संगठनों की माँग है कि नेशनल स्कूल को
राष्ट्रीय धरोहर घोषित किया जाए,
इसका संरक्षण और जीर्णोद्धार हो,
और इसे स्वतंत्रता आंदोलन के स्मृति केंद्र के रूप में विकसित किया जाए।
क्योंकि इतिहास सिर्फ किताबों में दर्ज नहीं होता,
वह इमारतों में भी सांस लेता है।
और अगर ये इमारतें ढह गईं,
तो आने वाली पीढ़ियाँ आज़ादी को सिर्फ एक तारीख समझेंगी