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बिहार की राजनीति और ‘राजद समाचार’: सामाजिक न्याय विमर्श का सशक्त दस्तावेज : रणविजय

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राम दुलार यादव 

बिहार की राजनीति का जिक्र हो और उसमें राष्ट्रीय जनता दल तथा लालू प्रसाद यादव का नाम न आए, यह कल्पना ही नहीं की जा सकती। 1990 के दशक में जब लालू प्रसाद बिहार के मुख्यमंत्री बने, उस दौर से ही राज्य की सत्ता-संरचनाओं में एक निर्णायक बदलाव की शुरुआत हुई। सदियों से द्विज-प्रभुत्व आधारित रहे सत्ता-तंत्र को चुनौती देते हुए लालू प्रसाद ने सामाजिक न्याय की ऐसी राजनीति उपस्थित की, जिसने पिछड़ों, अति पिछड़ों, दलितों, आदिवासियों और मुस्लिम समुदायों को राजनीतिक मुख्यधारा में स्थान दिया। यही वह बिंदु था जहां से बिहार की राजनीति केवल शासन-प्रशासन के स्तर पर नहीं, बल्कि सामाजिक-सांस्कृतिक चेतना के स्तर पर भी बदलने लगी।
लेकिन इस ऐतिहासिक परिवर्तन के बावजूद, मुख्यधारा का ‘सवर्ण मीडिया’ अक्सर लालू प्रसाद और राजद की उपलब्धियों को खलनायकत्व के फ्रेम में ढालने का प्रयास करता रहा है। दिलचस्प विडंबना यह है कि 2005 के बाद से राजद लगातार सत्ता से बाहर रही, फिर भी पिछले दो दशकों में बिहार के सामाजिक-आर्थिक पतन के लिए अक्सर उसी राजनीतिक धारा को दोषी ठहराने की प्रवृत्ति दिखाई देती रही। इस परिप्रेक्ष्य में ‘राजद’ का आधिकारिक मुखपत्र ‘राज्य समाचार’ महज़ प्रचार-पत्र नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय के विचार का दस्तावेज बनकर सामने आता है।
बहुत कम लोगों को यह जानकारी होगी कि ‘राजजद समाचार’ पिछले तीन-चार वर्षों से नियमित मासिक पत्रिका के रूप में प्रकाशित हो रही है। संभवतः भारत की किसी भी राजनीतिक पार्टी का मुखपत्र इतनी स्पष्ट वैचारिक विविधता, समृद्ध सामग्री और गहन विश्लेषण के साथ लगातार प्रकाशित नहीं होता। इस पत्रिका का ताज़ा 44वाँ अंक अर्थात् नवम्बर 2025 अंक विशेष रूप से बिहार विधानसभा चुनाव परिणामों पर केंद्रित है। इस अंक में ‘बिहार चुनाव का सियासी सच’ शीर्षक के अंतर्गत दस महत्वपूर्ण आलेख शामिल हैं, जो न केवल चुनाव परिणामों का विश्लेषण करते हैं, बल्कि सत्ता-संरचना, जातीय समीकरण, चुनाव आयोग की भूमिका और मीडिया नैरेटिव – सब पर गंभीर विमर्श प्रस्तुत करते हैं।
इन आलेखों में प्रियांशु कुशवाहा का लेख ‘संघर्षशील जनता का लूटा हुआ जनादेश’ जनता की आकांक्षाओं और वास्तविक नीतिगत राजनीति के बीच के फासले को रेखांकित करता है, तो हेमंत कुमार झा का ‘नकदी की चाल, जनादेश बेहाल’ चुनावी राजनीति में धन-बल की निर्णायक भूमिका को सामने लाता है। ध्रुव राठी ने ‘बिहार चुनाव: सत्ता–आयोग की साझी साजिश’ में चुनावी तंत्र और सत्ता-राजनीति के अंतर्संबंधों को सवालों के घेरे में रखा है। योगेन्द्र यादव का लेख ‘किसकी खुशी, किसका भ्रम’ जनता की मनःस्थिति और राजनीतिक मिथकों के द्वंद्व को उजागर करता है।
इस अंक के अन्य लेखों में प्रसन्न कुमार चौधरी की ‘बिहार की विलक्षण जंगलगाथा’, सिद्धार्थ रामू का ‘यादव हेट—किसकी राजनीति, किसका डर’, वीरेंद्र यादव का ‘शासन नहीं, सत्ता के वर्चस्व का उत्सव’, धीरेश सैनी का ‘नीतीश का बदला किरदार’ तथा रिंकू यादव और कुमार बिन्दु के लेख—ये सभी मिलकर बिहार की वर्तमान सत्ता व्यवस्था, सामाजिक न्याय की राजनीति पर हमले और ऊँची जातियों के बढ़ते प्रभुत्व का गहन विश्लेषण करते हैं।

इस अंक की एक बड़ी खासियत यह है कि इसमें 2025 के चुनाव में निर्वाचित विधायकों की क्षेत्रवार और जातिवार सूची के साथ-साथ मंत्रियों की जातिगत प्रोफाइल भी संकलित की गई है। यह सामग्री महज़ आंकड़ों का संग्रह नहीं, बल्कि यह दिखाती है कि बिहार की सत्ता-संरचना किस ओर झुक रही है और सामाजिक प्रतिनिधित्व का सवाल किस तरह फिर से संकटग्रस्त हो रहा है।
पत्रिका का सामयिक खंड भी उतना ही महत्वपूर्ण है। विजय चिंतामण सोनावणे का लेख ‘मैकाले: शिक्षा या औपनिवेशिक प्रयोग’ भारत की शिक्षा-व्यवस्था पर औपनिवेशिक हस्तक्षेप और उसके दीर्घकालीन प्रभावों को गंभीरता से परखता है। वहीं साहित्य खंड में महादेवी वर्मा का प्रसिद्ध रेखाचित्र ‘चीनी यात्री’ पाठकों को संवेदना, संस्कार और मानवीय दृष्टि के अनोखे संसार से जोड़ता है। यह चयन पत्रिका के व्यापक सांस्कृतिक दायरे को दर्शाता है।
इसके अतिरिक्त, पत्रिका ने हाल ही में दिवंगत सामाजिक-राजनीतिक और सांस्कृतिक व्यक्तित्वों—सच्चिदानंद सिन्हा (आनंद बिहारी), जगदीप सिंह छोकर, अवधेश प्रीत, जी.जी. पारिख और अभिनेता धर्मेन्द्र—पर भी संवेदनशील और विश्लेषणात्मक श्रद्धांजलि-लेख प्रकाशित किए हैं। इससे स्पष्ट होता है कि ‘राज्य समाचार’ केवल राजनीतिक बयानबाज़ी तक सीमित नहीं है, बल्कि अपने समय और समाज की स्मृतियों, सरोकारों और संघर्षशील परंपराओं का भी संरक्षण कर रही है।
कविता खंड में इस बार आदिवासी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर अश्विनी कुमार पंकज की कविताएँ प्रकाशित की गई हैं, जो नस्लीय और जातीय विभाजनों पर तीखा प्रहार करती हैं। इससे साबित होता है कि यह पत्रिका हाशिए की आवाज़ों को प्रमुखता देती है और सामाजिक न्याय की विचारधारा को सांस्कृतिक अभिव्यक्ति से भी जोड़ती है।
IMG 20251203 085234 224 बिहार की राजनीति और ‘राजद समाचार’: सामाजिक न्याय विमर्श का सशक्त दस्तावेज : रणविजयसमग्र रूप से देखा जाए तो ‘राजद समाचार’ का यह अंक बिहार की राजनीति में जातिगत वर्चस्व की वापसी, चुनावी नैरेटिव के निर्माण में मीडिया और संस्थागत ताकतों की भूमिका तथा सामाजिक न्याय की राजनीति के सामने खड़ी नई चुनौतियों पर एक गंभीर और बौद्धिक हस्तक्षेप है। लालू प्रसाद और राजद की राजनीतिक यात्रा को आज जिस तरह एकतरफा नकारात्मक कलेवर में पेश किया जाता है, यह पत्रिका उस मिथक को तोड़ती है और बिहार की राजनीति के वास्तविक सामाजिक चरित्र को सामने लाती है।
दरअसल, यह अंक सिर्फ़ चुनाव परिणामों की व्याख्या नहीं, बल्कि बिहार की राजनीति के बदलते स्वरूप पर गहन चिंतन है। यह बताता है कि सामाजिक न्याय की राजनीति केवल सत्ता प्राप्ति का साधन नहीं, बल्कि हाशिए पर रहे समुदायों की आवाज़, उनकी आकांक्षाओं और उनके आत्मसम्मान की रक्षा का संघर्ष भी है। ऐसे समय में जब तथाकथित ‘मुख्यधारा मीडिया’ लोकतांत्रिक विमर्श को सजावटी शब्दों और चयनित सत्य तक सीमित कर दे, ‘राजजद समाचार’ जैसी पत्रिका लोकतंत्र की वास्तविक आत्मा—विविधता, प्रतिनिधित्व और प्रतिरोध—को जीवित रखने का कार्य कर रही है।
पत्रिका : राजद समाचार (मासिक)
अंक : नवंबर 2025
पृष्ठ : 40 कीमत : 40 रुपये
स्थान : 2 बीरचंद पटेल पथ राजद कार्यालय पटना 80001